मध्य प्रदेश विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026 पारित

मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026

हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा ने अपने मानसून सत्र के दौरान भारी राजनीतिक विरोध के बीच ‘मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026’ को ध्वनि मत (Voice Vote) से पारित कर दिया है। विपक्षी दलों ने इस विधेयक को गहन विचार-विमर्श के लिए ‘प्रवर समिति’ (Select panel) के पास भेजने की मांग की थी।

प्रमुख बिंदु

  • विधेयक के मुख्य प्रावधान:
    • यह विधेयक विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि से संबंधित व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) में एकरूपता लाने का प्रयास करता है।
    • इसके तहत बहुविवाह (Polygamy) और निकाह हलाला’ (Nikah Halala) जैसी प्रथाओं को पूरी तरह से आपराधिक कृत्य (Criminalise) घोषित किया गया है।
    • यह राज्य में लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in relationships) का पंजीकरण (Registration) कराना अनिवार्य बनाता है।
  • आदिवासी समुदाय को छूट (Exemption):
    • इस कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि राज्य की एक बड़ी जनजातीय/आदिवासी (Tribal) आबादी को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। यह छूट इसलिए दी गई है ताकि आदिवासियों की विशिष्ट प्रथाओं और रीति-रिवाजों का संरक्षण किया जा सके।
  • सरकार का रुख और तर्क:
    • मुख्यमंत्री ने इस विधेयक को संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर के विजन के अनुरूप बताया और इसका विरोध करने के लिए विपक्ष (कांग्रेस) पर ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ का आरोप लगाया।
    • सरकार का तर्क है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने (तीन तलाक को खत्म करने की तर्ज पर) और समाज के सभी वर्गों के लिए एक समान न्याय प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है।

समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?

  • परिभाषा: समान नागरिक संहिता (UCC) का अर्थ है पूरे देश के लिए एक समान कानून का होना, जो धर्म, जाति या लिंग की परवाह किए बिना सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो।
  • दायरा: यह मुख्य रूप से व्यक्तिगत मामलों (Personal matters) से संबंधित है, जिनमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण (Alimony), विरासत (Inheritance), संपत्ति का अधिकार और गोद लेना (Adoption) शामिल हैं। वर्तमान में भारत में विभिन्न समुदायों के अपने अलग-अलग धार्मिक/व्यक्तिगत कानून हैं (जैसे- हिंदू विवाह अधिनियम, मुस्लिम पर्सनल लॉ आदि)।
  • संवैधानिक प्रावधान: भारतीय संविधान के भाग-IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व – DPSP) के अनुच्छेद 44 में यह उल्लेख किया गया है कि “राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।”
  • वर्तमान स्थिति: वर्तमान में गोवा भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ UCC लागू है (पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 के रूप में)। हाल ही में उत्तराखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।

भारत के लिए UCC की प्रासंगिकता

  • लैंगिक न्याय और समानता (Gender Justice): अधिकांश धार्मिक व्यक्तिगत कानून पितृसत्तात्मक (Patriarchal) हैं और महिलाओं के अधिकारों (जैसे संपत्ति का अधिकार, तलाक के नियम) को सीमित करते हैं। UCC लागू होने से सभी महिलाओं को समान और न्यायसंगत अधिकार प्राप्त होंगे।
  • राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration): एक देश, एक कानून की अवधारणा देशवासियों के बीच एकरूपता और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देगी। यह लोगों को उनके धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक समान राष्ट्रीय पहचान देगा।
  • कानूनों का सरलीकरण (Simplification of Laws): वर्तमान में व्यक्तिगत कानूनों की जटिलता के कारण न्यायपालिका पर भारी बोझ पड़ता है। एक समान संहिता होने से कानूनी प्रक्रिया सरल होगी और अदालतों में लंबित मामलों का तेजी से निपटारा हो सकेगा।
  • सच्ची धर्मनिरपेक्षता (True Secularism): एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में कानून धर्म के आधार पर नहीं होना चाहिए। UCC यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य नागरिक अधिकारों के मामलों में धार्मिक नियमों के बजाय संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का पालन करे।
  • अनुच्छेद 14 और 15 का सम्मान: यह कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) और धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव के निषेध (अनुच्छेद 15) जैसे मौलिक अधिकारों को मजबूत करेगा।

UCC से जुड़ी चिंताएं और मुद्दे

  • विविधता और बहुलवाद को खतरा: भारत अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। अल्पसंख्यकों को यह आशंका है कि UCC के नाम पर उन पर बहुसंख्यक समुदाय के सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्य थोप दिए जाएंगे, जो संविधान के अनुच्छेद 25 (अंतःकरण और धर्म के अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता) का उल्लंघन हो सकता है।
  • आदिवासी प्रथागत कानूनों से टकराव: भारत के जनजातीय समुदायों (Tribal communities) के अपने अनूठे प्रथागत कानून हैं, जिन्हें संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची तथा अनुच्छेद 371 के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है। UCC इन प्रथाओं के साथ सीधा टकराव पैदा कर सकता है।
  • आम सहमति का अभाव (Lack of Consensus): यह एक अत्यधिक संवेदनशील और राजनीतिकरण वाला मुद्दा है। विभिन्न धार्मिक समुदायों, रूढ़िवादी संगठनों और राजनीतिक दलों के बीच इस पर भारी मतभेद हैं।
  • ड्राफ्टिंग की जटिलता: एक ऐसा कानून तैयार करना जो सभी धर्मों की अच्छी बातों को शामिल करे और किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत न करे, कानूनी और सामाजिक रूप से एक अत्यंत कठिन कार्य है।

भविष्य की रणनीति

  • समानता पर जोर, एकरूपता पर नहीं (Focus on Equality, not just Uniformity): 21वें विधि आयोग (Law Commission) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि “इस स्तर पर UCC न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है।” इसके बजाय, आयोग ने सुझाव दिया कि सरकार को सभी धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभावपूर्ण प्रथाओं को हटाने (Piecemeal reform) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • व्यापक विचार-विमर्श (Broad-based Consultation): इस कानून को ऊपर से थोपने (Top-down approach) के बजाय, सभी हितधारकों— धार्मिक नेताओं, कानूनी विशेषज्ञों, महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज— के साथ संवाद के माध्यम से ‘बॉटम-अप’ (Bottom-up) दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
  • जागरूकता और गैर-राजनीतिकरण: UCC के मुद्दे को राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाने के बजाय, जनता के बीच इसके कानूनी और सामाजिक लाभों के बारे में जागरूकता फैलाई जानी चाहिए।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन (Gradual Implementation): अचानक पूरे देश में एक नया कानून लागू करने के बजाय, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से सुधार किए जाने चाहिए ताकि समाज इसे सहजता से स्वीकार कर सके।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: हाल ही में पारित ‘मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026’ और भारतीय संविधान के प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह विधेयक राज्य में बहुविवाह को अपराध घोषित करता है और लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य बनाता है।
  2. इस विधेयक के प्रावधान राज्य की जनजातीय (Tribal) आबादी सहित सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे।
  3. भारतीय संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 44 राज्य को भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c) केवल 1 और 3

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है। विधेयक बहुविवाह को रोकता है और लिव-इन को पंजीकृत करना अनिवार्य बनाता है।
  • कथन 2 गलत है। विधेयक में मध्य प्रदेश की बड़ी आदिवासी (Tribal) आबादी को इसके दायरे से स्पष्ट रूप से छूट (Exempt) दी गई है।
  • कथन 3 सही है। संविधान का अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) समान नागरिक संहिता की वकालत करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “भारत में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता (Uniformity) लाने के प्रयास अक्सर धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता के अधिकारों के साथ टकराव पैदा करते हैं।” कुछ राज्यों द्वारा पारित समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक के प्रावधानों और इसके इर्द-गिर्द जारी राजनीतिक-संवैधानिक बहसों के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

दृष्टिकोण (Approach for Mains Answer):

  • प्रस्तावना (Introduction): देश के विभिन्न राज्यों द्वारा पारित पारित UCC विधेयक, 2026 और संविधान के अनुच्छेद 44 (नीति निदेशक तत्व) का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
  • मुख्य भाग 1 (UCC के पक्ष में तर्क और लाभ): लैंगिक न्याय (Gender Justice) सुनिश्चित करना, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा (बहुविवाह और निकाह हलाला का उन्मूलन), और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में ‘एक देश, एक कानून’ की अवधारणा को स्पष्ट करें।
  • मुख्य भाग 2 (टकराव और चिंताएं): धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक अधिकारों के साथ इसका टकराव। आदिवासियों को छूट देने से उत्पन्न होने वाली विसंगतियां— यदि बहुसंख्यक आबादी और एक विशेष अल्पसंख्यक वर्ग पर ही इसे लागू किया जा रहा है, तो क्या यह वास्तव में ‘समान’ (Uniform) है?
  • निष्कर्ष (Conclusion): विधि आयोग की पूर्व टिप्पणियों का संदर्भ देते हुए निष्कर्ष निकालें कि कानूनों में सुधार आवश्यक है, लेकिन इसे ऊपर से थोपने के बजाय समुदायों के बीच व्यापक सहमति, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श (जैसे प्रवर समिति के माध्यम से) और बहुलवाद (Pluralism) का सम्मान करते हुए लागू किया जाना चाहिए।

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