कावेरी नदी बेसिन में जल संकट

नदी जल विवाद एवं संकट

विषय: राजव्यवस्था एवं शासन तथा भूगोल (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- II और I)

हाल ही में, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority – CWMA) ने नई दिल्ली में आयोजित अपनी बैठक में कर्नाटक और तमिलनाडु को कड़े निर्देश दिए हैं। प्राधिकरण ने कहा है कि दोनों राज्य अपने जलाशयों में उपलब्ध जल का उपयोग कड़ाई से केवल पेयजल’ (Drinking Water) उद्देश्यों के लिए ही सीमित रखें।

प्रमुख बिंदु

  • संकटग्रस्त वर्ष’ (Distress Year) की आशंका:
    • CWMA ने भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमानों का हवाला देते हुए कहा है कि आने वाले दिनों में वर्षा के लिहाज से समय और भी कठिन हो सकता है।
    • इस स्थिति को देखते हुए, वर्तमान वर्ष को कावेरी बेसिन के लिए एक ‘संकटग्रस्त वर्ष’ के रूप में देखा जा रहा है।
  • सिंचाई पर रोक और पेयजल को प्राथमिकता:
    • वर्तमान में कर्नाटक और तमिलनाडु के जलाशयों में उपलब्ध जल भंडार केवल उनकी पेयजल आवश्यकताओं को ही पूरा कर सकता है।
    • प्राधिकरण ने दोनों राज्यों को चेतावनी दी है कि वे जल भंडार का उपयोग सिंचाई (Irrigation) सहित किसी भी अन्य उद्देश्य के लिए न करें। यदि जल का विवेकपूर्ण (Judiciously) उपयोग किया गया, तो पेयजल संकट से बचा जा सकता है।
  • जल के कोटे में कमी और यथास्थिति (Status Quo):
    • बैठक में यह दर्ज किया गया कि कर्नाटक ने तमिलनाडु के लिए जून में केवल 2.5 tmcft (Thousand Million Cubic Feet) और जुलाई में अब तक 0.54 tmcft पानी ही छोड़ा है, जो कि निर्धारित मात्रा से काफी कम है।
    • CWMA ने फिलहाल जल छोड़ने और उसके उपयोग के संबंध में दोनों राज्यों को ‘यथास्थिति’ बनाए रखने का निर्देश दिया है।

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण

  • गठन और पृष्ठभूमि: कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (Cauvery Water Management Authority – CWMA)का गठन केंद्र सरकार द्वारा जून 2018 में किया गया था। अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 6A के तहत सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के 2018 के अंतिम फैसले को लागू करने के लिए इसे स्थापित किया गया।
  • संरचना (Composition): इस प्राधिकरण का नेतृत्व केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक अध्यक्ष करता है। इसमें बेसिन के चारों राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों (कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी) के प्रतिनिधि और केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अधिकारी शामिल होते हैं।
  • मुख्य कार्य (Mandate): इसका प्राथमिक कार्य यह सुनिश्चित करना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कोटे के अनुसार ऊपरी तटवर्ती राज्य (कर्नाटक) द्वारा निचले राज्यों (तमिलनाडु आदि) के लिए समय पर जल छोड़ा जाए।
  • सहायक निकाय (CWRC की भूमिका): CWMA की सहायता के लिए ‘कावेरी जल नियमन समिति’ (Cauvery Water Regulation Committee – CWRC) भी काम करती है, जो जलाशयों के जल स्तर, वर्षा के आंकड़े और मौसम के पूर्वानुमान जैसी जमीनी हकीकत की निगरानी करती है।

कावेरी नदी बेसिन (The Cauvery Basin)

  • भौगोलिक विस्तार: कावेरी बेसिन दक्षिण भारत के चार राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में फैला हुआ है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा तमिलनाडु (लगभग 44,000 वर्ग किमी) का है, जिसके बाद कर्नाटक (लगभग 34,000 वर्ग किमी), केरल (लगभग 2,800 वर्ग किमी) और पुडुचेरी (लगभग 160 वर्ग किमी) आते हैं।
  • उद्गम और प्रवाह: कावेरी नदी कर्नाटक के पश्चिमी घाट में स्थित ब्रह्मगिरी पर्वतमाला के ‘तालकावेरी’ (Talakaveri) से निकलती है और दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए तमिलनाडु के पूमपुहार (Poompuhar) में बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
  • प्रमुख सहायक नदियां: इसकी प्रमुख बायीं तट की सहायक नदियां हरंगी, हेमावती, अर्कवती और शिमशा हैं। दायीं तट की प्रमुख सहायक नदियों में लक्ष्मणतीर्थ, काबिनी, भवानी, नोय्याल और अमरावती शामिल हैं।
  • आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व: इसे ‘दक्षिण की गंगा’ कहा जाता है। यह बेसिन तमिलनाडु के तंजावुर डेल्टा (जिसे दक्षिण का चावल का कटोरा कहा जाता है) सहित लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई करता है और यह दक्षिण-पश्चिम तथा उत्तर-पूर्व, दोनों मानसूनों पर निर्भर है।

संकट के समय जल साझाकरण’ फॉर्मूला

  • परिभाषा: ‘संकटग्रस्त वर्ष’ (Distress Year) उस स्थिति को कहते हैं जब मानसून की विफलता के कारण नदी बेसिन में सामान्य से कम वर्षा होती है। ऐसे समय में पानी के बँटवारे के लिए जो तंत्र अपनाया जाता है, उसे संकट साझाकरण फॉर्मूला कहा जाता है।
  • आनुपातिक कटौती (Pro-Rata Basis): सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार, यदि बेसिन में पानी की कुल उपलब्धता में कमी आती है, तो किसी एक राज्य को पूरा कोटा देने के बजाय, सभी राज्यों के निर्धारित कोटे में आनुपातिक रूप से (Pro-rata) कटौती की जाती है।
  • स्पष्ट गणितीय फॉर्मूले का अभाव: विवाद का सबसे बड़ा कारण यह है कि ‘संकट’ को मापने और पानी कम करने का कोई सर्वमान्य, सटीक गणितीय फॉर्मूला मौजूद नहीं है। CWMA को हर बार मौसम और जल भंडारण की स्थिति के अनुसार गतिशील (Dynamic) निर्णय लेना पड़ता है।
  • प्राथमिकताओं का टकराव: संकट के समय ऊपरी राज्य (कर्नाटक) अपनी पेयजल आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता है, जबकि निचला राज्य (तमिलनाडु) अपनी खड़ी फसलों (सिंचाई) को बचाने के लिए पानी की मांग करता है, जिससे राजनीतिक तनाव उत्पन्न होता है।

भारत में नदी जल विवाद: संविधानिक एवं वैधानिक प्रावधान

  • संवैधानिक प्रावधान: संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत जल ‘राज्य सूची’ (प्रविष्टि 17) का विषय है, लेकिन अंतर्राज्यीय नदियों के विनियमन का अधिकार ‘संघ सूची’ (प्रविष्टि 56) के तहत संसद को प्राप्त है। विवादों के समाधान के लिए अनुच्छेद 262 का प्रावधान किया गया है।
  • कानूनी ढांचा: अनुच्छेद 262 के तहत संसद ने ‘अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956’ (ISRWD Act) पारित किया, जो केंद्र सरकार को बातचीत विफल होने पर न्यायाधिकरण (Tribunal) गठित करने का अधिकार देता है।
  • प्रमुख वर्तमान विवाद: कावेरी के अलावा, भारत में कई अन्य गंभीर जल विवाद सक्रिय हैं— जैसे सतलुज-यमुना लिंक नहर विवाद (पंजाब-हरियाणा), कृष्णा जल विवाद (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश), और महानदी विवाद (ओडिशा-छत्तीसगढ़)।
  • न्यायाधिकरणों की विफलता: तदर्थ (Ad-hoc) न्यायाधिकरणों द्वारा फैसला सुनाने में दशकों का समय लग जाता है (जैसे कावेरी ट्रिब्यूनल को 17 साल लगे)। साथ ही, राज्यों द्वारा इन फैसलों का अनुपालन न करने से मामले अक्सर सर्वोच्च न्यायालय में अटक जाते हैं।

नदी जल विवादों के कारण

  • मांग और आपूर्ति में भारी अंतर: तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण पानी की मांग बेतहाशा बढ़ी है, जबकि नदी की जल वहन क्षमता स्थिर है या गाद (Siltation) के कारण कम हो गई है।
  • कृषि का स्वरूप और फसल चक्र: दोनों राज्यों (कर्नाटक और तमिलनाडु) में किसानों द्वारा धान (Paddy) और गन्ना (Sugarcane) जैसी अत्यधिक जल-गहन (Water-guzzling) फसलों की खेती की जाती है, जो बेसिन की क्षमता से अधिक पानी सोखती हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून: अल नीनो (El Nino) प्रभाव, बदलता वेदर पैटर्न और लगातार पड़ने वाले सूखे के कारण जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं भर पाता है, जो जल संकट और राज्यों के बीच टकराव को जन्म देता है।
  • राजनीतिकरण और ऐतिहासिक संधियाँ: जल एक अत्यधिक संवेदनशील और ‘वोट-बैंक’ से जुड़ा मुद्दा है। राज्य सरकारें स्थानीय दबाव के कारण समझौता करने से बचती हैं। इसके अलावा, कावेरी विवाद की जड़ें मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर राज्य के बीच 1892 और 1924 में हुए उन ऐतिहासिक समझौतों में भी हैं, जिन्हें कर्नाटक आज अपने विकास के लिए अनुचित मानता है।

भविष्य की रणनीति

  • स्थायी जल विवाद न्यायाधिकरण: बार-बार अलग-अलग ट्रिब्यूनल बनाने के बजाय, ‘अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक’ के प्रावधानों के अनुरूप एक ‘एकल स्थायी न्यायाधिकरण’ (Single Standing Tribunal) की स्थापना की जानी चाहिए, जिसकी समय-सीमा सख्त हो।
  • आपूर्ति प्रबंधन से ‘मांग प्रबंधन’ की ओर बदलाव: राज्यों को जल-गहन फसलों के बजाय कम पानी में उगने वाली फसलों (Crop diversification) को बढ़ावा देना चाहिए। कृषि में सूक्ष्म-सिंचाई (Drip/Sprinkler) को बड़े पैमाने पर लागू करना अनिवार्य है।
  • नदी बेसिन प्रबंधन दृष्टिकोण (River Basin Approach): नदी को राज्यों की सीमाओं में बांटने के बजाय, पूरे बेसिन को एक एकल पारिस्थितिक और आर्थिक इकाई मानकर ‘रिवर बेसिन संगठनों’ (RBOs) का गठन किया जाना चाहिए।
  • वैज्ञानिक डेटा साझाकरण (Scientific Data Grid): राजनीति को दूर रखने के लिए जल प्रवाह, वर्षा और वाष्पीकरण का सटीक अनुमान लगाने वाला एक स्वतंत्र और पारदर्शी ‘राष्ट्रीय जल डेटा ग्रिड’ (National Hydrological Data Grid) होना चाहिए, जिस पर सभी राज्यों का भरोसा हो।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: कावेरी नदी जल विवाद और ‘कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण’ (CWMA) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. कावेरी नदी बेसिन का विस्तार केवल कर्नाटक और तमिलनाडु राज्यों तक ही सीमित है।
  2. कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) का गठन अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम फैसले को लागू करने के लिए किया गया था।
  3. CWMA यह सुनिश्चित करता है कि संकट (कम वर्षा) के वर्षों में भी निचले तटवर्ती राज्यों को जल का एक निश्चित (Fixed) कोटा बिना किसी कटौती के प्राप्त हो।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) केवल 2

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है। कावेरी नदी बेसिन का विस्तार चार राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों- कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में है।
  • कथन 2 सही है। CWMA का गठन 2018 में केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लागू करने के लिए किया गया था।
  • कथन 3 गलत है। ‘संकटग्रस्त वर्षों’ (Distress years) में, जब बारिश कम होती है, तो बेसिन में उपलब्ध कुल जल के अनुपात में (Pro-rata basis) सभी राज्यों के कोटे में कटौती की जाती है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “भारत में अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद केवल कानूनी और तकनीकी मुद्दे नहीं हैं, बल्कि ये गंभीर राजनीतिक और पारिस्थितिक संकट भी हैं।” कावेरी जल विवाद और वर्तमान ‘संकटग्रस्त वर्ष’ (Distress Year) की स्थितियों के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

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