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सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें भारत में मृत्युदंड देने के तरीके के रूप में फांसी की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने माना कि ऐतिहासिक ‘दीना बनाम भारत संघ (1983)’ के फैसले को एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने का कोई पर्याप्त आधार नहीं बनता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका यह आदेश केंद्र सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने से नहीं रोकता है, जो मृत्युदंड के ऐसे वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा कर सके जिनसे कम शारीरिक आघात पहुंचे और मानवीय गरिमा बेहतर ढंग से बनी रहे।
वैधानिक ढांचा
धारा 354(5), CrPC, 1973
यह प्रावधान करती है कि जब किसी व्यक्ति को मृत्युदंड दिया जाता है, तो आदेश में यह निर्देश होगा कि दोषी को “मृत्यु होने तक गर्दन से लटकाया जाए।”
यह प्रावधान सामान्य आपराधिक कानून के तहत दी गई मौत की सजा पर लागू होता है।
धारा 393(5), BNSS, 2023
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 ने कई मायनों में CrPC की जगह ले ली है।
यह भी मृत्युदंड के लिए फांसी को सजा के तरीके के रूप में निर्धारित करने वाले एक समान प्रावधान को बरकरार रखती है।
सैन्य कानून (Military laws)
सेना अधिनियम, नौसेना अधिनियम और वायु सेना अधिनियम के तहत, कोर्ट-मार्शल प्रक्रियाओं के अधीन कुछ मामलों में गोली मारकर सजा देने (execution by shooting) की अनुमति है।
यह दर्शाता है कि भारतीय कानून पहले से ही विशिष्ट संदर्भों में मृत्युदंड के विभिन्न तरीकों को मान्यता देता है।
याचिकाकर्ता की दलीलें (Petitioner’s Contentions)
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा द्वारा दायर इस जनहित याचिका में तर्क दिया गया कि:
- फांसी से मृत्युदंड देने पर लंबे समय तक शारीरिक दर्द और पीड़ा होती है।
- यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
- आधुनिक और कम दर्दनाक तरीकों जैसे:
- घातक इंजेक्शन (Lethal injection)
- अक्रिय गैस श्वासावरोध (Inert gas asphyxiation)की खोज की जानी चाहिए या उन्हें अपनाया जाना चाहिए।
- याचिकाकर्ता ने सरकार को समकालीन चिकित्सा और वैज्ञानिक समझ के अनुरूप मृत्युदंड के अधिक मानवीय तरीकों की जांच करने और लागू करने का निर्देश देने की मांग की।
पूर्व-निर्णय: दीना बनाम भारत संघ (1983)
‘दीना बनाम भारत संघ’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने मृत्युदंड के विभिन्न तरीकों की जांच की थी, जिनमें शामिल थे:
- फांसी
- गोली मारना
- बिजली का झटका (Electrocution)
- घातक गैस (Lethal gas)
- घातक इंजेक्शन (Lethal injection)
न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला था कि:
- धारा 354(5), CrPC के तहत निर्धारित फांसी में, उस समय उपलब्ध अन्य तरीकों की तुलना में कोई अनावश्यक दर्द या क्रूरता शामिल नहीं है।
- यह विधि संवैधानिक रूप से वैध है और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करती है।
- मृत्युदंड अपने आप में असंवैधानिक नहीं है, लेकिन मृत्युदंड का तरीका क्रूर, बर्बर या अपमानजनक नहीं होना चाहिए।यह फैसला चार दशकों से अधिक समय से मृत्युदंड के तरीके पर एक बाध्यकारी नजीर (precedent) बना हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट का 2026 का फैसला (Supreme Court’s 2026 Ruling)
‘दीना’ मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार
खंडपीठ ने माना कि प्रस्तुत किए गए तर्क ‘दीना’ मामले के स्थापित पूर्व-निर्णय को फिर से खोलने को उचित नहीं ठहराते हैं।
न्यायालय ने 1983 के फैसले पर पुनर्विचार के लिए इसे बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया।
भविष्य में न्यायिक जांच की संभावना
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका यह आदेश भविष्य की न्यायिक जांच के दरवाजे बंद नहीं करता है।
यदि उपयुक्त कार्यवाही में न्यायालय के समक्ष पर्याप्त और ठोस वैज्ञानिक या चिकित्सा अनुभवजन्य साक्ष्य (empirical evidence) प्रस्तुत किए जाते हैं, तो इस मुद्दे पर फिर से विचार किया जा सकता है।
कार्यकारी कार्रवाई की गुंजाइश
पीठ ने उल्लेख किया कि केंद्र सरकार निम्नलिखित के लिए स्वतंत्र है:
- एक विशेषज्ञ समिति का गठन करना।
- मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा करना।
- यह जांचना कि क्या अन्य तरीके शारीरिक आघात को कम कर सकते हैं और मानवीय गरिमा को बनाए रख सकते हैं।यह फैसला, न्यायिक चुनौती खारिज होने के बावजूद, नीति-स्तर पर सुधार की गुंजाइश छोड़ता है।
मृत्युदंड के तरीकों में वैश्विक प्रथाएं (Global Practices in Execution Methods)
घातक इंजेक्शन (Lethal injection)
- संयुक्त राज्य अमेरिका के कई राज्यों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
- इसमें बेहोशी, लकवा और कार्डियक अरेस्ट (हृदय गति रुकना) पैदा करने के लिए दवाओं का संयोजन दिया जाता है।
- इसे निम्नलिखित कारणों से आलोचना का सामना करना पड़ा है:
- सजा देने में विफलता (Botched executions)।
- दवाओं की कमी।
- चिकित्सा पेशेवरों की भागीदारी से जुड़ी नैतिक चिंताएं।अक्रिय गैस श्वासावरोध (Inert gas asphyxiation)
- ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु का कारण बनने के लिए नाइट्रोजन या अन्य अक्रिय गैसों का उपयोग करता है।
- कुछ समर्थकों का तर्क है कि यह दर्दरहित और तीव्र है।
- अभी भी अपेक्षाकृत नया है और इसे सार्वभौमिक रूप से नहीं अपनाया गया है।अन्य तरीके
- विभिन्न अधिकार क्षेत्रों में बिजली का झटका, घातक गैस, फायरिंग स्क्वाड और फांसी का उपयोग जारी है।
- कई देशों ने मृत्युदंड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।
- अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निकाय तेजी से यह तर्क दे रहे हैं कि मृत्युदंड के सभी तरीकों में कुछ हद तक पीड़ा शामिल होती है।
- भारत उन देशों में से एक है जो “दुर्लभ से दुर्लभ” (rarest of rare) मामलों के लिए मृत्युदंड को बरकरार रखता है, जिसमें फांसी मानक तरीका है।
संवैधानिक मुद्दे (Constitutional Issues)
अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 21 गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उसके जीवन या स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इसकी व्याख्या करते हुए इसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार और क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ सुरक्षा को शामिल किया है।
मूल प्रश्न यह है कि क्या मृत्युदंड के तरीके के रूप में फांसी अनुच्छेद 21 के गरिमा घटक का उल्लंघन करती है।
आनुपातिकता और विकसित होते मानक (Proportionality and evolving standards)
न्यायालय ने अधिकारों पर आधारित मामलों में तेजी से आनुपातिकता परीक्षण (proportionality test) लागू किया है।
पिछली टिप्पणियों में, पीठ ने उल्लेख किया था कि 1983 के ‘दीना’ फैसले में आनुपातिकता परीक्षण लागू नहीं किया गया था या विभिन्न तरीकों के बीच दर्द और पीड़ा पर अनुभवजन्य डेटा की तुलना नहीं की गई थी।
हालांकि, 2026 के फैसले में, न्यायालय को इस आधार पर ‘दीना’ के फैसले को पलटने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिले।
शक्तियों का पृथक्करण (Separation of powers)
न्यायालय ने संकेत दिया कि यद्यपि वह पूर्व-निर्णय पर पुनर्विचार नहीं कर रहा है, लेकिन कार्यपालिका वैकल्पिक तरीकों की जांच कर सकती है।
यह न्यायिक संयम को दर्शाता है और नीतिगत नवाचार को सरकार पर छोड़ता है, जो आवश्यकता पड़ने पर भविष्य की संवैधानिक जांच के अधीन हो सकता है।
महत्व (Significance)
आपराधिक न्याय के लिए
- यह पुष्टि करता है कि भारत में फांसी मृत्युदंड का वैध तरीका बनी हुई है।
- ‘दीना’ पूर्व-निर्णय की बाध्यकारी प्रकृति को सुदृढ़ करता है।
- नए वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर भविष्य की चुनौतियों की संभावना को खुला छोड़ता है।मानवाधिकारों के लिए
- इस बहस को जीवित रखता है कि क्या मृत्युदंड के तरीकों को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है।
- मृत्युदंड को बनाए रखने और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा की संवैधानिक आवश्यकता के बीच के तनाव को उजागर करता है।शासन (Governance) के लिए
- यह संकेत देता है कि सरकार मृत्युदंड के तरीकों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ निकाय का गठन कर सकती है।
- एक संवेदनशील क्षेत्र में साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को प्रोत्साहित करता है।
- कार्यकारी सुधार की गुंजाइश के साथ न्यायिक अंतिमता को संतुलित करता है।
चुनौतियां और चिंताएं (Challenges and Concerns)
- विभिन्न मृत्युदंड के तरीकों से जुड़े दर्द और पीड़ा पर व्यापक भारतीय अनुभवजन्य डेटा का अभाव।
- सजा देने की प्रक्रिया में चिकित्सा पेशेवरों की संलिप्तता के संबंध में नैतिक चिंताएं।
- स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बिना नए तरीकों को मनमाने ढंग से या असंगत रूप से अपनाने का जोखिम।
- मानवीय-गरिमा के तर्कों और मृत्युदंड पर जनमत के बीच संभावित टकराव।
- मृत्युदंड को समाप्त करने या प्रतिबंधित करने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव।
भविष्य की रणनीति
सरकार एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर सकती है जिसमें निम्नलिखित शामिल हों:
- चिकित्सा पेशेवर।
- फोरेंसिक विशेषज्ञ।
- कानूनी विद्वान।
- मानवाधिकार प्रतिनिधि।
समिति निम्नलिखित की जांच कर सकती है:
- विभिन्न तरीकों के बीच दर्द और पीड़ा की तुलना।
- घातक इंजेक्शन, अक्रिय गैस श्वासावरोध या अन्य विकल्पों की व्यवहार्यता।
- नैतिक, कानूनी और रसद (logistical) संबंधी निहितार्थ।
किसी भी सुधार को:
- अनुच्छेद 21 और मौजूदा नजीरों (precedents) का पालन करना चाहिए।
- पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।
- मनमाने या भेदभावपूर्ण अनुप्रयोग से बचना चाहिए।
- यदि कोई नया तरीका अपनाया जाता है, तो संसद स्पष्ट वैधानिक सुरक्षा उपायों के साथ BNSS में संशोधन करने पर विचार कर सकती है।
महत्वपूर्ण शब्दावली (Important Terms)
- मृत्युदंड (Death penalty): सबसे गंभीर अपराधों के लिए दी जाने वाली सजा, जो “दुर्लभ से दुर्लभ” (rarest of rare) सिद्धांत के अधीन है।
- धारा 354(5), CrPC: मृत्युदंड के लिए सजा के तरीके के रूप में फांसी को निर्धारित करने वाला प्रावधान।
- धारा 393(5), BNSS: 2023 की आपराधिक प्रक्रिया संहिता में संबंधित प्रावधान।
- अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी, जिसकी व्याख्या गरिमा और क्रूर व्यवहार से सुरक्षा को शामिल करने के लिए की गई है।
- आनुपातिकता परीक्षण (Proportionality test): यह आकलन करने की न्यायिक विधि कि क्या अधिकारों पर लगाया गया प्रतिबंध उपयुक्त, आवश्यक और संतुलित है।
- घातक इंजेक्शन (Lethal injection): मृत्यु का कारण बनने के लिए दवाओं के प्रशासन से जुड़ी मृत्युदंड की एक विधि।
- अक्रिय गैस श्वासावरोध (Inert gas asphyxiation): ऑक्सीजन की कमी से मृत्यु का कारण बनने के लिए नाइट्रोजन या अन्य अक्रिय गैसों का उपयोग करने वाली मृत्युदंड की एक विधि।
- दीना बनाम भारत संघ (1983): मृत्युदंड के तरीके के रूप में फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाला ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला।
प्रारंभिक परीक्षा तथ्य (Prelims Facts)
- मामला: फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (2026)।
- पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता।
- वैधानिक प्रावधान: धारा 354(5), CrPC, 1973 और धारा 393(5), BNSS, 2023।
- पूर्व-निर्णय (Precedent): दीना बनाम भारत संघ (1983) ने फांसी को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया।
- न्यायालय का रुख: ‘दीना’ मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने का कोई पर्याप्त आधार नहीं; फिलहाल फांसी ही विधि बनी रहेगी।
- न्यायालय का स्पष्टीकरण: यदि ठोस वैज्ञानिक या चिकित्सा साक्ष्य प्रस्तुत किए जाते हैं तो भविष्य में न्यायिक जांच संभव है।
- कार्यकारी गुंजाइश: केंद्र सरकार मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर सकती है।
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (Prelims Practice)
प्रश्न 1. भारत में मृत्युदंड दिए जाने के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- CrPC, 1973 की धारा 354(5) में प्रावधान है कि मृत्युदंड पाने वाले व्यक्ति को मृत्यु होने तक गर्दन से लटकाया जाएगा।
- दीना बनाम भारत संघ (1983) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि फांसी की सजा संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में ‘दीना’ के फैसले को एक बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया।ऊपर दिए गए कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?(a) केवल 1 और 2(b) केवल 2 और 3(c) केवल 1 और 3(d) 1, 2 और 3उत्तर: (c)व्याख्या: धारा 354(5), CrPC सजा के तरीके के रूप में फांसी को निर्धारित करती है। दीना (1983) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था और माना था कि यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करता है। 2026 में, न्यायालय ने ‘दीना’ को एक बड़ी पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया।
प्रश्न 2. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
| प्रावधान / वाद | विषय |
| 1. धारा 354(5), CrPC | मृत्युदंड की सजा देने का तरीका |
| 2. अनुच्छेद 21, संविधान | जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार |
| 3. दीना बनाम भारत संघ (1983) | मृत्युदंड के तरीके के रूप में फांसी की वैधता |
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
व्याख्या: धारा 354(5), CrPC मृत्युदंड देने के तरीके से संबंधित है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। दीना बनाम भारत संघ फांसी की संवैधानिक वैधता पर एक ऐतिहासिक मामला है।
प्रश्न 3. फांसी द्वारा मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट का 2026 का फैसला मुख्य रूप से क्या इंगित करता है?
(a) फांसी को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है और इसे तुरंत बदला जाना चाहिए
(b) भारत में मृत्युदंड को ही समाप्त कर दिया गया है
(c) फांसी वैध तरीका बनी हुई है, लेकिन सरकार एक विशेषज्ञ समिति के माध्यम से वैकल्पिक तरीकों का पता लगा सकती है
(d) मौत की सजा पाने वाले सभी कैदियों को सजा का अपना तरीका चुनने का विकल्प दिया जाना चाहिए
उत्तर: (c)
व्याख्या: न्यायालय ने फिलहाल फांसी को वैध तरीके के रूप में बरकरार रखा है, ‘दीना’ फैसले को बड़ी बेंच के पास भेजने से इनकार कर दिया, लेकिन स्पष्ट किया कि सरकार दर्द को कम करने और गरिमा को बनाए रखने वाले मृत्युदंड के वैकल्पिक तरीकों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर सकती है।
