जम्मू-कश्मीर में ‘फ्लैश फ्लड’ और आपदा प्रबंधन

जम्मू-कश्मीर में 'फ्लैश फ्लड'

विषय: आपदा प्रबंधन एवं भूगोल (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- III और I)

हाल ही में, जम्मू-कश्मीर के पुंछ (Poonch) और राजौरी (Rajouri) जिलों में मूसलाधार बारिश के कारण ‘फ्लैश फ्लड’ (Flash Floods) और भूस्खलन (Landslides) से जानमाल का भारी नुकसान हुआ है। इस प्राकृतिक आपदा में 11 लोगों की मृत्यु हो गई है और कई लोग लापता हैं, जिसने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा तैयारियों की आवश्यकता को फिर से उजागर कर दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • प्रभावित क्षेत्र और नुकसान
    • पीर पंजाल घाटी (Pir Panjal valley) में स्थित पुंछ जिला इस बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है।
    • राजौरी और किश्तवाड़ जिलों में भी भारी वर्षा के कारण 100 से अधिक घर, लगभग दो दर्जन स्कूल और कई सार्वजनिक संपत्तियां नष्ट हो गई हैं।
    • भूस्खलन के कारण कई क्षेत्रों में यातायात बुरी तरह बाधित हुआ है।
  • प्रशासनिक प्रतिक्रिया और बचाव कार्य
    • नागरिक प्रशासन, पुलिस, सेना और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) द्वारा स्थानीय स्वयंसेवकों के साथ मिलकर युद्ध स्तर पर बचाव अभियान चलाया जा रहा है।
    • प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता लापता लोगों की तलाश करना और प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना है।
    • बाधित हुई सड़क, बिजली, पेयजल और संचार नेटवर्क जैसे आवश्यक सेवाओं को तत्काल बहाल करने के निर्देश दिए गए हैं।
  • अमरनाथ यात्रा का निलंबन:
    • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी किए गए प्रतिकूल मौसम पूर्वानुमान (23 जुलाई तक भारी वर्षा की चेतावनी) के कारण, बालटाल (Baltal) और पहलगाम (Pahalgam) दोनों मार्गों से अमरनाथ यात्रा को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया है।
    • पहाड़ी क्षेत्रों, नदियों और जलधाराओं के पास रहने वाले लोगों तथा पर्यटकों के लिए विशेष एडवाइजरी (Advisory) जारी की गई है।
  • केंद्र सरकार का सहयोग:
    • केंद्रीय गृह मंत्री ने स्थिति की समीक्षा की है और जम्मू-कश्मीर प्रशासन (उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री) को बचाव एवं राहत कार्यों के लिए केंद्र की ओर से हरसंभव तकनीकी और रसद (Logistics) सहायता का आश्वासन दिया है।

फ्लैश फ्लड’ क्या है?

  • परिभाषा: ‘फ्लैश फ्लड’ अत्यधिक और तीव्र वर्षा की वह स्थिति है जिसमें बारिश होने के कुछ ही घंटों (आमतौर पर 6 घंटे से कम समय) के भीतर जल स्तर अचानक और बहुत तेजी से बढ़ जाता है।
  • उत्पत्ति एवं तंत्र (Origin and Mechanism): इसकी उत्पत्ति अक्सर स्थानीय स्तर पर ‘बादल फटने’ (Cloudburst) या तीव्र चक्रवाती तूफानों के कारण होती है।
    • जब किसी छोटे से जलग्रहण क्षेत्र (Catchment area) में कम समय में अत्यधिक पानी बरसता है, तो मिट्टी की जल सोखने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
    • यह जल सतह पर तेजी से बहने लगता है और अपने साथ भारी मात्रा में मलबा, चट्टानें और कीचड़ लेकर नीचे की ओर आता है, जो इसके विनाशकारी प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।

फ्लैश फ्लड’ के प्रमुख कारण

  • प्राकृतिक कारण:
    • बादल फटना (Cloudbursts): हिमालयी क्षेत्रों में मानसून के दौरान यह एक सामान्य घटना है।
    • ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों (Glaciers) के तेजी से पिघलने से बनी झीलों के तटबंधों का अचानक टूटना।
    • प्राकृतिक बांधों का टूटना: भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, और जब यह प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है तो निचली घाटियों में फ्लैश फ्लड आ जाता है।
  • मानवीय कारण:
    • अनियोजित विकास: नदियों के बाढ़ क्षेत्रों (Floodplains) और जल निकासी मार्गों (Drainage channels) पर अतिक्रमण एवं अवैध निर्माण।
    • वनों की कटाई: पेड़ों की कटाई से मिट्टी की जल धारण क्षमता कम हो जाती है, जिससे सतह का अपवाह (Surface Runoff) तेज हो जाता है।
    • अवैज्ञानिक अवसंरचना विकास: जलविद्युत परियोजनाओं, सुरंगों और सड़कों के निर्माण के लिए पहाड़ों को काटना एवं मलबे (Muck) को सीधे नदियों में डाल देना।

फ्लैश फ्लड’ से बचाव

राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) ने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए निम्नलिखित सुरक्षा उपाय सुझाए हैं:

  • आपदा से पूर्व (Before):
    • मौसम विभाग (IMD) की चेतावनियों और रेडियो/टीवी अपडेट्स पर लगातार नजर रखें।
    • घर में एक ‘इमरजेंसी किट’ तैयार रखें जिसमें प्राथमिक उपचार का सामान, टॉर्च, बैटरी, सूखा राशन और जरूरी दस्तावेज हों।
  • आपदा के दौरान (During):
    • बाढ़ का पानी बढ़ने पर तुरंत ऊंचे और सुरक्षित स्थानों की ओर चले जाएं।
    • पैदल या वाहन से पानी पार न करें: NDRF के अनुसार, मात्र 6 इंच बहता हुआ पानी किसी इंसान को गिरा सकता है और 2 फीट पानी भारी वाहनों (कारों) को बहा ले जाने के लिए काफी होता है।
    • बिजली के खंभों, गिरे हुए तारों और नालों से दूर रहें।
  • आपदा के पश्चात (After):
    • जब तक अधिकारी सुरक्षित न घोषित करें, तब तक अपने घर वापस न लौटें।
    • बाढ़ के पानी के संपर्क में आने से बचें (बीमारियों और करंट लगने का खतरा) और पीने के लिए केवल उबला हुआ या सुरक्षित पानी ही उपयोग करें।

हिमालय पर्वतमाला की संवेदनशीलता

  • युवा और भंगुर स्थलाकृति: हिमालय दुनिया के सबसे युवा (Young Fold Mountains) पहाड़ हैं। यहां की चट्टानें अभी भी अस्थिर और भंगुर (Fragile) हैं, जो भारी बारिश के दौरान भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
  • खड़ी ढलानें (Steep Gradients): हिमालय की घाटियां ‘V’ आकार की और अत्यंत खड़ी हैं। जब यहाँ भारी बारिश होती है, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण पानी को नीचे आने में बहुत कम समय लगता है, जिससे फ्लैश फ्लड की गति और मारक क्षमता बहुत अधिक होती है।
  • जलवायु परिवर्तन का हॉटस्पॉट: इसे ‘तीसरा ध्रुव’ (Third Pole) कहा जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहाँ मौसमी चक्र अनिश्चित हो गया है, जिससे अल्प समय में अत्यधिक वर्षा (Extreme Weather Events) की घटनाएं बढ़ रही हैं।

भविष्य की रणनीति

  • पूर्व चेतावनी प्रणालियों (EWS) का सुदृढ़ीकरण: हिमालयी क्षेत्रों में डॉपलर वेदर रडार (Doppler Weather Radars) के नेटवर्क का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि बादल फटने और भारी बारिश की सटीक तथा समयबद्ध चेतावनी दी जा सके।
  • बाढ़ क्षेत्र का कड़ाई से सीमांकन (Floodplain Zoning): नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और किनारों पर किसी भी प्रकार के निर्माण कार्यों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। इसके लिए सख्त ज़ोनिंग कानून लागू करना अनिवार्य है।
  • पारिस्थितिकी-अनुकूल अवसंरचना: पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क या पुल निर्माण के दौरान ‘बायो-इंजीनियरिंग’ (Bio-engineering) और प्राकृतिक ढलानों के स्थिरीकरण (Slope Stabilization) की तकनीकों का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • सामुदायिक क्षमता निर्माण: स्थानीय समुदायों को आपदा के समय प्रथम-प्रतिक्रियाकर्ता (First Responders) बनाने के लिए NDRF और SDRF द्वारा नियमित मॉक ड्रिल (Mock Drills) और जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: हालिया बाढ़ से प्रभावित जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों और भौगोलिक विशेषताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. पुंछ और राजौरी जिले मुख्य रूप से पीर पंजाल (Pir Panjal) पर्वतमाला क्षेत्र में स्थित हैं।
  2. अमरनाथ यात्रा मुख्य रूप से दो मार्गों— बालटाल और पहलगाम— के माध्यम से आयोजित की जाती है।
  3. भारत में ‘अचानक आई बाढ़’ (Flash Floods) की पूर्व चेतावनी (Early Warning) जारी करने के लिए नोडल एजेंसी ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (NDMA) है, न कि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD)।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) केवल 1 और 2

व्याख्या:

  • कथन 1 सही है। पुंछ और राजौरी पीर पंजाल घाटी का हिस्सा हैं।
  • कथन 2 सही है। अमरनाथ गुफा तक पहुँचने के लिए पारंपरिक रूप से पहलगाम और बालटाल मार्गों का उपयोग किया जाता है।
  • कथन 3 गलत है। मौसम संबंधी चरम घटनाओं और फ्लैश फ्लड के लिए पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी जारी करने की प्राथमिक जिम्मेदारी भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की है। NDMA नीति निर्माण और समग्र आपदा प्रबंधन का कार्य करता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “हिमालयी क्षेत्रों में ‘अचानक आई बाढ़’ (Flash Floods) और भूस्खलन की बढ़ती घटनाएं केवल प्राकृतिक नहीं हैं, बल्कि इसमें अनियोजित मानवीय गतिविधियों का भी बड़ा योगदान है।” जम्मू-कश्मीर की हालिया आपदा के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए और इन क्षेत्रों में आपदा न्यूनीकरण (Disaster Mitigation) के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

दृष्टिकोण (Approach for Mains Answer):

  • प्रस्तावना (Introduction): पुंछ और राजौरी में आई हालिया बाढ़ और जानमाल के नुकसान का संदर्भ देते हुए उत्तर की शुरुआत करें।
  • मुख्य भाग 1 (बाढ़ के कारण):
    • प्राकृतिक कारण: जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाएं (Extreme weather events), बादल फटना और हिमालय की खड़ी स्थलाकृति।
    • मानवीय कारण: इको-सेंसिटिव जोन में अनियोजित निर्माण, नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment areas) में अतिक्रमण, वनों की कटाई और अवैज्ञानिक सड़क निर्माण (जैसे ढलानों को काटना)।
  • मुख्य भाग 2 (आपदा न्यूनीकरण के उपाय):
    • पूर्व चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) और डॉपलर वेदर रडार (Doppler Weather Radars) का सुदृढ़ीकरण।
    • सख्त ज़ोनिंग नियम (Zoning laws) लागू करना और नदियों के बाढ़ क्षेत्र (Floodplains) में निर्माण पर रोक।
    • स्थानीय समुदायों और SDRF का क्षमता निर्माण (Capacity building)।
  • निष्कर्ष (Conclusion): स्पष्ट करें कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए विकास का एक स्थायी (Sustainable) मॉडल अपनाना आवश्यक है, जो प्रकृति के साथ संघर्ष के बजाय सह-अस्तित्व पर आधारित हो।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *