Table of Contents
विषय: राजव्यवस्था एवं शासन (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- II)
आगामी मानसून सत्र (20 जुलाई 2026 से शुरू) से ठीक पहले, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 6 शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे – UBT) सांसदों के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दे दी है।
- इसके साथ ही, तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अलग हुए 20 बागी सांसदों के एक नए गुट को भी सदन में अलग बैठने (Separate Seating) की अनुमति दी गई है, जिन्होंने ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) नामक दल में विलय का दावा किया है।
प्रमुख बिंदु
- शिवसेना (UBT) सांसदों का विलय
- लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी के बाद निचले सदन में शिंदे गुट (शिवसेना) के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 13 हो गई है, जबकि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले UBT गुट के पास अब केवल 3 सांसद शेष बचे हैं।
- अध्यक्ष ने यह निर्णय दोनों गुटों की सुनवाई करने और संसदीय विशेषज्ञों व पुराने दृष्टांतों पर विचार करने के बाद लिया है।
- TMC में विभाजन और नया गुट
- पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बगावत करते हुए NCPI में विलय करने का पत्र सौंपा है।
- इस बागी गुट ने सुदीप बंद्योपाध्याय को अपना नेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (Chief Whip) चुना है।
- हालांकि अध्यक्ष ने अभी तक NCPI के रूप में उनके विलय को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उन्हें सदन में अलग बैठने की व्यवस्था प्रदान कर दी गई है।
भारत में दल-बदल विरोधी कानून
- संवैधानिक प्रावधान: भारत में राजनीतिक दल-बदल की कुप्रथा (जिसे ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति कहा जाता था) को रोकने के लिए वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में 10वीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी गई।
- अयोग्यता के आधार: कोई सदस्य अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वह:
- स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
- सदन में अपनी पार्टी के सचेतक (Whip) के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है (15 दिन के भीतर क्षमादान न मिलने पर)।
- कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- कोई मनोनीत सदस्य 6 महीने की समाप्ति के बाद किसी दल में शामिल होता है।
- अपवाद (विलय): 91वें संविधान संशोधन अधिनियम (2003) के अनुसार, यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय (Merger) करते हैं, तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती है।
- निर्णय प्राधिकारी: अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) द्वारा लिया जाता है। ‘किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू’ (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि स्पीकर का निर्णय ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के अधीन है।
हाल के समय के दल-बदल संबंधी घटनाएँ
- महाराष्ट्र का राजनीतिक संकट (2022-23): शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुआ भारी विभाजन, जहां एकनाथ शिंदे और अजित पवार के गुटों ने अपनी-अपनी मूल पार्टियों के दो-तिहाई से अधिक विधायकों के समर्थन का दावा किया। बाद में चुनाव आयोग ने इन विद्रोही गुटों को ही असली पार्टी के रूप में मान्यता दे दी।
- लोकसभा में हालिया घटनाक्रम (2026): शिवसेना (UBT) के 6 लोकसभा सांसदों का शिंदे गुट में विलय और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा नए दल ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय का प्रयास।
- राज्यों में ‘ऑपरेशन लोटस‘ के आरोप: इससे पूर्व मध्य प्रदेश (2020) और कर्नाटक (2019) में सत्ता पक्ष के विधायकों द्वारा सामूहिक रूप से इस्तीफा देने और बाद में दूसरी पार्टी के टिकट पर उपचुनाव लड़ने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिससे चुनी हुई सरकारें गिर गईं।
वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता
- सरकारों की स्थिरता: यह कानून आज भी ‘खुदरा दल-बदल’ (Retail defection) यानी एक या दो विधायकों/सांसदों को दल बदलने से रोकता है, जिससे सरकारों को दैनिक आधार पर गिरने से बचाया जा सका है।
- जनादेश का सम्मान: चुनाव भारतीय राजनीति में पार्टी के प्रतीकों (Election Symbols) और विचारधाराओं पर लड़े जाते हैं। यह कानून इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि जिस पार्टी के नाम पर वोट मांगा गया है, सदस्य उसके प्रति वफादार रहें।
- पार्टी अनुशासन: यह व्हिप के माध्यम से सदन के भीतर पार्टी अनुशासन बनाए रखने में एक प्रासंगिक भूमिका निभाता है।
- राजनीतिक भ्रष्टाचार और ‘हॉर्स-ट्रेडिंग‘ पर रोक: वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में धनबल, मंत्री पद के प्रलोभन का प्रचलन बढ़ गया है। यह कानून जन-प्रतिनिधियों की खुलेआम खरीद-फरोख्त को हतोत्साहित करने के लिए वैधानिक ढाल के रूप में कार्य करता है। इसके बिना संसदीय लोकतंत्र पूरी तरह से अवसरवादिता और भ्रष्टाचार का शिकार हो जाएगा।
भारत के समग्र राजनीति पर प्रभाव
- ‘थोक‘ दल-बदल को वैधानिकता: कानून ने ‘खुदरा दल-बदल’ को तो रोक दिया, लेकिन 2/3 सदस्यों के विलय के प्रावधान ने ‘थोक दल-बदल‘ (Wholesale defection) को वैधानिक मान्यता दे दी है। यह कानून की सबसे बड़ी विफलता है।
- आंतरिक लोकतंत्र का पतन: व्हिप (Whip) के डर के कारण सांसद और विधायक अपने विवेक (Conscience) या अपने निर्वाचन क्षेत्र के हितों के अनुसार स्वतंत्र रूप से मतदान नहीं कर पाते हैं। वे मात्र पार्टी आलाकमान की रबर स्टैंप बनकर रह गए हैं।
- पीठासीन अधिकारी (Speaker) की निष्पक्षता पर सवाल: स्पीकर अक्सर अपनी मूल पार्टी के प्रति वफादार बने रहते हैं। वे सत्ता पक्ष के फायदे के लिए अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में महीनों या वर्षों की देरी करते हैं, क्योंकि संविधान में कोई समय-सीमा तय नहीं है।
- विधायकों का इस्तीफा और उपचुनाव लूपहोल: विधायकों द्वारा अयोग्यता से बचने के लिए सीधे ‘इस्तीफा’ दे देना और फिर विपक्षी दल के टिकट पर उपचुनाव जीतकर मंत्री बन जाना दल-बदल कानून के मुख्य उद्देश्य को ही विफल कर रहा है।
भविष्य की रणनीति
- निर्णय शक्ति का हस्तांतरण: दिनेश गोस्वामी समिति और चुनाव आयोग की सिफारिशों के अनुसार, अयोग्यता का निर्णय पीठासीन अधिकारी से छीनकर, चुनाव आयोग की बाध्यकारी सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल को सौंप दिया जाना चाहिए।
- समय-सीमा का निर्धारण: ‘कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम माननीय अध्यक्ष (2020)’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव के अनुसार, स्पीकर के लिए अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने हेतु अधिकतम 3 महीने की समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए।
- व्हिप (Whip) का सीमित उपयोग: आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए व्हिप का प्रयोग केवल अविश्वास प्रस्ताव, विश्वास मत, या बजट (Money Bill) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।
- विलय प्रावधान की समाप्ति: विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट के अनुसार, 10वीं अनुसूची से “विभाजन या विलय” के आधार पर मिलने वाली छूट को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यदि कोई भी सदस्य दल-बदल करता है, तो उसे अनिवार्य रूप से इस्तीफा देकर नया जनादेश (Fresh Mandate) लेना चाहिए।
प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Prelims Question)
प्रश्न: भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी राजनीतिक दल के निर्वाचित सदस्यों को अयोग्यता से बचने के लिए, उस दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का किसी अन्य दल में विलय होना आवश्यक है।
- संसद के किसी भी सदन में सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित अंतिम निर्णय चुनाव आयोग की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (a) केवल 1
व्याख्या:
- कथन 1 सही है: 91वें संविधान संशोधन अधिनियम (2003) के बाद, किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के विलय (Merger) को ही दल-बदल विरोधी कानून से छूट प्राप्त है।
- कथन 2 गलत है: 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) द्वारा लिया जाता है, न कि राष्ट्रपति द्वारा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Mains Question)
प्रश्न: “हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों में विभाजन और विलय की घटनाओं ने संविधान की दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।” लोकसभा में हुए हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के आलोक में इस कानून की खामियों का विश्लेषण कीजिए और आवश्यक सुधार सुझाइए। (250 शब्द)
दृष्टिकोण (Approach for Mains Answer):
- प्रस्तावना (Introduction): दसवीं अनुसूची (52वें संविधान संशोधन) के मुख्य उद्देश्य का संक्षिप्त परिचय दें और वर्तमान संदर्भ (शिवसेना तथा TMC सांसदों का हालिया विलय) का उल्लेख करें।
- मुख्य भाग 1 (कानून की कमियां/खामियां):
- ‘दो-तिहाई’ (2/3) विलय के नियम का दुरुपयोग, जिसे अक्सर ‘थोक दल-बदल’ को वैधानिकता प्रदान करने के रूप में देखा जाता है।
- पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष) की निष्पक्षता पर सवाल और निर्णय लेने के लिए किसी निश्चित समय-सीमा का न होना।
- पार्टी लाइन और सांसदों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति/स्वतंत्रता के बीच का वैचारिक टकराव।
- मुख्य भाग 2 (आवश्यक सुधार):
- चुनाव आयोग या किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण (Tribunal) को अयोग्यता का निर्णय सौंपने पर विचार किया जाना चाहिए (दिनेश गोस्वामी समिति की सिफारिशें)।
- स्पीकर के लिए समय-सीमा (जैसे 3 महीने) तय की जानी चाहिए (सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ)।
- निष्कर्ष (Conclusion): स्पष्ट करें कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक नैतिकता और संस्थागत स्वायत्तता को बनाए रखना भी अत्यंत आवश्यक है।
