न्यायपालिका तक 24×7 पहुंच के लिए SOP

सर्वोच्च न्याया में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले की सुनवाई

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले मामलों (जैसे- अवैध हिरासत, घरों को गिराना, हिरासत में हिंसा, निर्वासन या अन्य राज्य कार्रवाइयों) में नागरिकों को दिन या रात किसी भी समय अदालतों का दरवाजा खटखटाने की अनुमति देने के लिए एक ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) तैयार करने पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की है।

प्रमुख बिंदु

  • याचिका का आधार और आवश्यकता:
    • सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में यह तर्क दिया गया कि देर रात होने वाली गिरफ्तारियों, तड़के की जाने वाली ध्वस्तीकरण (Demolitions) की कार्रवाई और सप्ताहांत या छुट्टियों के दौरान होने वाली कार्यकारी कार्रवाइयों के मद्देनजर अदालतों का बंद रहना उचित नहीं है।
    • एक संरचित और संस्थागत तंत्र के अभाव में प्रभावित व्यक्तियों को संवैधानिक अदालतों तक पहुँचने से पहले ही अपरिवर्तनीय परिणामों” (Irreversible consequences) का सामना करना पड़ सकता है।
  • अदालत की टिप्पणियां और प्रतिक्रिया समय (Response Time):
    • मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने जीवन और स्वतंत्रता के मामलों में तत्काल अनुरोधों पर “प्रतिक्रिया समय” कम करने के लिए SOP की आवश्यकता को स्वीकार किया। अदालत की प्रतिक्रिया ऐसे मामलों में एक घंटे के भीतर आनी चाहिए।
    • न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि कार्यालय समय के बाद न्याय तक पहुँचने में एक “क्रमिक दृष्टिकोण” (Graded approach) को न्याय से इनकार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
  • प्रशासनिक बनाम न्यायिक आदेश:
    • सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया कि यह SOP सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने न्यायिक पक्ष के बजाय ‘प्रशासनिक पक्ष’ पर तैयार किया जाना चाहिए।
    • इसके जवाब में मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि संघीय ढांचे (Federal set-up) में उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासनिक दायरे में नहीं आते हैं, इसलिए इस पर न्यायिक पक्ष से सुनवाई और आदेश पारित करने की आवश्यकता हो सकती है।
  • न्याय तक डिजिटल पहुंच और तकनीकी एकीकरण:
    • न्यायालय ने रेखांकित किया कि ई-फाइलिंग के माध्यम से न्याय तक डिजिटल पहुंच होने पर अदालतें कभी “बंद” नहीं होती हैं। एक पत्र, ईमेल या फोन कॉल भी न्याय प्रणाली को सक्रिय करने के लिए पर्याप्त है।
    • याचिकाकर्ता ने भी सहमति व्यक्त की कि डिजिटल फाइलिंग, इलेक्ट्रॉनिक कोर्ट रिकॉर्ड और वर्चुअल सुनवाई जैसी तकनीकी प्रगति ने न्याय तक दूरस्थ पहुंच को बढ़ाया है।
    • हालाँकि, इन तकनीकी क्षमताओं को अभी तक एक समान संस्थागत ढांचे (Uniform institutional framework) में एकीकृत नहीं किया गया है, जो नियमित अदालती समय के बाहर आपातकालीन न्यायिक पहुंच सुनिश्चित कर सके।

इस कदम का महत्व (Significance of the Move)

  • अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) की वास्तविक रक्षा: संविधान का अनुच्छेद 21 सबसे मौलिक अधिकार है। 24×7 न्यायिक पहुंच यह सुनिश्चित करेगी कि जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा केवल ‘कार्यालय समय’ (Office hours) तक सीमित न रहे, बल्कि यह एक निरंतर (Continuous) गारंटी बने।
  • तदर्थ (Ad-hoc) व्यवस्था से संस्थागत तंत्र की ओर बदलाव: वर्तमान में, रात में या छुट्टी के दिन अदालत का दरवाजा खटखटाना पूरी तरह से मुख्य न्यायाधीश के विशेषाधिकार या तदर्थ व्यवस्था पर निर्भर करता है। SOP लागू होने से यह एक मानकीकृत और संस्थागत तंत्र (Institutionalized mechanism) बन जाएगा, जो सभी नागरिकों के लिए समान रूप से सुलभ होगा।
  • न्यायिक तकनीकी बुनियादी ढांचे का अधिकतम उपयोग: ई-फाइलिंग, ई-कोर्ट और वर्चुअल हियरिंग पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। इस कदम से इन डिजिटल क्षमताओं का वास्तविक अर्थों में उपयोग हो सकेगा, जिससे वादियों (Litigants) को अदालत भवन में भौतिक रूप से उपस्थित हुए बिना ही आपातकालीन न्याय मिल सकेगा।
  • कानून के शासन (Rule of Law) में विश्वास: यह कदम इस सिद्धांत को मजबूत करेगा कि “कानून कभी नहीं सोता।” इससे आम नागरिकों का न्याय प्रणाली और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास और गहरा होगा।

भविष्य की रणनीति

  • आपातकालीन’ मामलों की स्पष्ट परिभाषा (Defining Urgency): SOP में स्पष्ट रूप से यह परिभाषित होना चाहिए कि किन मामलों को ‘अत्यंत जरूरी’ (Extremely urgent) माना जाएगा (जैसे- मृत्युदंड पर रोक, अवैध हिरासत)। इससे यह सुनिश्चित होगा कि नियमित या तुच्छ मामलों (Frivolous petitions) के लिए इस सुविधा का दुरुपयोग न हो।
  • समर्पित रोस्टर प्रणाली (Dedicated Roster System): सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को आपातकालीन सुनवाई के लिए न्यायाधीशों और कोर्ट स्टाफ की एक समर्पित ‘रोस्टर प्रणाली’ (ड्यूटी चार्ट) बनानी चाहिए, जो सप्ताहांत, रात्रिकाल और छुट्टियों के दौरान सक्रिय रहे।
  • उच्च न्यायालयों के साथ समन्वय (Coordination with High Courts): चूंकि भारत के संघीय ढांचे में सर्वोच्च न्यायालय का उच्च न्यायालयों पर सीधा प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है, इसलिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के साथ परामर्श करके एक सर्वसम्मति (Consensus-based) आधारित राष्ट्रीय दिशा-निर्देश विकसित करने चाहिए।
  • दुरुपयोग के खिलाफ निवारक उपाय (Deterrence against Misuse): इस प्रणाली को ओवरलोड होने से बचाने के लिए, उन वकीलों या वादियों पर भारी जुर्माना (Exemplary costs) लगाया जाना चाहिए जो बिना किसी वास्तविक आपात स्थिति के आधी रात को अदालतों का समय बर्बाद करते हैं।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारतीय न्यायपालिका के प्रशासनिक और न्यायिक ढांचे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत के संघीय ढांचे के अंतर्गत, देश के सभी उच्च न्यायालय (High Courts) सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आते हैं।
  2. भारतीय संविधान के तहत संवैधानिक उपचार का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए न्यायालयों में ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई जैसी तकनीकी प्रगति को अपनाया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (b) केवल 2

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: भारत में एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली है (निचली अदालतें उच्च न्यायालय के अधीन और उच्च न्यायालय सर्वोच्च न्यायालय के अधीन), लेकिन प्रशासनिक दृष्टिकोण से (Federal set-up में) उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय के प्रशासनिक दायरे/नियंत्रण में नहीं आते हैं। उनका अपना स्वतंत्र प्रशासनिक नियंत्रण होता है।
  • कथन 2 सही है: त्वरित और सुलभ न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका ने डिजिटल फाइलिंग, ईमेल और ई-कोर्ट जैसी प्रणालियों को अपनाया है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न (Mains Question)

प्रश्न: “कानून के शासन द्वारा शासित एक संवैधानिक लोकतंत्र में, स्वतंत्रता की रक्षा अदालती समय-सारिणी की सीमाओं पर निर्भर नहीं रह सकती है।” जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा हेतु 24×7 न्यायिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक ‘मानक संचालन प्रक्रिया’ (SOP) की आवश्यकता के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

दृष्टिकोण (Approach for Mains Answer):

  • प्रस्तावना (Introduction): अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का संदर्भ देते हुए हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष उठे 24×7 न्यायिक पहुंच और SOP के मुद्दे का संक्षिप्त उल्लेख करें।
  • मुख्य भाग 1 (SOP की आवश्यकता क्यों?):
    • देर रात गिरफ्तारियां, तड़के ध्वस्तीकरण (Demolition) और छुट्टियों में कार्यकारी कार्रवाइयों के उदाहरण दें।
    • बताएं कि कैसे समय पर न्यायिक हस्तक्षेप न होने से नागरिकों को अपरिवर्तनीय परिणामों (Irreversible consequences) का सामना करना पड़ता है।
  • मुख्य भाग 2 (वर्तमान चुनौतियां और तकनीकी एकीकरण):
    • यद्यपि ई-फाइलिंग और वर्चुअल कोर्ट जैसी तकनीकी प्रगति उपलब्ध है, लेकिन एक समान और स्पष्ट संस्थागत ढांचे (Uniform Institutional Framework) का अभाव है।
    • प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र की सीमाएं (सुप्रीम कोर्ट बनाम हाई कोर्ट का प्रशासनिक दायरा)।
  • निष्कर्ष (Conclusion): स्पष्ट करें कि “न्याय में देरी, न्याय से इनकार है।” एक प्रभावी SOP का निर्माण न केवल राज्य की मनमानी को रोकेगा, बल्कि यह सुनिश्चित करेगा कि संविधान का संरक्षण चौबीसों घंटे सक्रिय रहे।

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