भारत के प्रस्तावित कैफे-III (CAFE III) मानदंड

वाहन के ईंधन दक्षता की माप

विषय: अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- III)

हाल ही में, विद्युत मंत्रालय ने कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता 2027 मानदंड (Draft Corporate Average Fuel Economy 2027 Norms- CAFE) III मानदंडों का ड्राफ्ट जारी किया है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऑटोमोबाइल उद्योग ‘आंतरिक दहन इंजन’ (ICE) की जगह ‘इलेक्ट्रिक वाहनों’ (EV) को अपनाए को प्राथमिकता दे रहा है। विशेषज्ञ इसे भारत की कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मान रहे है।

कैफे (CAFE) मानदंड क्या हैं?

  • परिचय: यह वाहन उद्योग के लिए सरकार द्वारा निर्धारित एक महत्वपूर्ण मानक है, जिसका उद्देश्य वाहनों के प्रदूषण को कम करना और उनकी माइलेज (ईंधन दक्षता) को बढ़ाना है।
  • लागू: ये मानदंड 2027-28 से 2031-32 के दौरान भारत में बिक्री के लिए विनिर्मित या आयातित एम1 श्रेणी के यात्री वाहनों पर लागू करने का प्रस्ताव है।
  • पूरे बेड़े पर लागू: CAFE मानक किसी एक विशेष कार या मॉडल पर लागू नहीं होता है।
  • इसके बजाय, यह किसी वाहन निर्माता कंपनी (जैसे- टाटा, मारुति, महिंद्रा आदि) द्वारा एक वित्तीय वर्ष में बेची गई सभी कारों के ‘बिक्री-भारित औसत’ (Sales-weighted average) पर लागू होता है।
  • संतुलन का सिद्धांत: यह मानदंड संतुलन के सिद्धांत पर कार्य करत है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कोई कंपनी ज्यादा ईंधन खपत करने वाली और अधिक धुआं छोड़ने वाली बड़ी गाड़ियाँ (जैसे भारी SUVs) बेचती है, तो उसे अपना ‘औसत’ (Average) सरकार द्वारा तय सीमा के भीतर रखने के लिए बहुत कम ईंधन खपत करने वाली या शून्य-उत्सर्जन वाली गाड़ियाँ (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन या हाइब्रिड) भी पर्याप्त संख्या में बेचनी होंगी।
  • उद्देश्य: तेल आयात पर निर्भरता कम करना और ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कम करना है।
  • लक्ष्य: वित्त वर्ष 2031-32 तक यात्री वाहनों के औसत उत्सर्जन को लगभग 113 gCO2/km से घटाकर 77 gCO2/km करना है।
  • पहले छोटे और हल्के वाहनों को जो छूट दी गई थी, उसे अब हटा दिया गया है।

भारत में CAFE मानदंड: वर्तमान संदर्भ

भारत में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) तथा ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा इसे लागू किया जाता है:

  • CAFE-I: 2017 से 2022 तक लागू रहा।
  • CAFE-II: अप्रैल 2022 से लागू हुआ, जिसमें उत्सर्जन सीमा को सख्त किया गया।
  • CAFE-III (प्रस्तावित): वर्तमान में सरकार CAFE-III का मसौदा (Draft) तैयार कर रही है, जिसे 2027 से 2032 तक लागू करने की योजना है। इसमें प्रति किलोमीटर कार्बन उत्सर्जन की सीमा को घटाकर 77 ग्राम CO2 प्रति किलोमीटर (77 gCO2/km) करने का अत्यधिक कड़ा लक्ष्य रखा गया है।

यदि कोई वाहन निर्माता कंपनी CAFE मानदंडों के लक्ष्य को पूरा करने में विफल रहती है, तो ‘ऊर्जा संरक्षण अधिनियम’ (Energy Conservation Act) के तहत उस पर भारी जुर्माना (Penalty) लगाया जाता है।

वैश्विक स्थिति

संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)

  • इन मानदंडों की शुरुआत सबसे पहले 1975 में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में हुई थी।
  • 1973 के अरब तेल प्रतिबंध (Arab oil embargo) के बाद, अमेरिका ने तेल आयात पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वाहन निर्माताओं पर यह नियम लागू किया था।
  • ताकि वे अधिक माइलेज वाली छोटी कारें बनाएं। बाद में 1990 के दशक में इसे पर्यावरण (ग्रीनहाउस गैसों को कम करने) से जोड़ दिया गया।

चीन का सफल मॉडल

  • 2018 में चीन ने ‘दोहरी क्रेडिट प्रणाली’ (Dual Credit System) पेश की थी। इसके तहत निर्माताओं को CAFC (ईंधन खपत) मानकों के साथ-साथ NEV (न्यू एनर्जी व्हीकल/EV) क्रेडिट आवश्यकताओं को भी पूरा करना होता है।
  • यदि कोई कंपनी (जैसे मारुति सुजुकी) EV नहीं बनाती है, तो उसे टाटा या महिंद्रा जैसी EV बनाने वाली कंपनियों से क्रेडिट खरीदना होगा।
  • इसने नवाचार को बढ़ावा दिया और चीन में EV की बिक्री (2025 में 55% अनुमानित) में भारी उछाल आया।

CAFE III: चिंताएं

भारत द्वारा वाहन से प्रदूषण को कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसे 77 gCO2/km करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जिसे विशेषज्ञ महत्वाकांक्षी मानते है। लेकिन, ड्राफ्ट में कई ऐसे प्रावधान (Flexibilities) हैं जो इसकी सख्ती को कमजोर करते हैं:

  1. कार्बन तटस्थता कारक (Carbon Neutrality Factor): उच्च इथेनॉल ब्लेंडिंग (जैसे E20) वाले वाहनों को अनुपालन में छूट मिलती है।

समस्या: E20 के बाद सरकार की नीति स्पष्ट नहीं है। साथ ही, इथेनॉल महंगा है और इसका माइलेज पेट्रोल से कम होता है।

  1. सुपर क्रेडिट (Super Credits): बैटरी EV, प्लग-इन हाइब्रिड और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहनों को बेड़े की गणना में अतिरिक्त वेटेज मिलता है।

समस्या: इसके कारण कंपनियां कम EV बेचकर भी अपने उच्च-उत्सर्जन वाले ICE वाहनों की भरपाई कर सकती हैं। ‘स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड’ (जो मुख्य रूप से पेट्रोल/डीजल पर ही चलते हैं) को भी यह लाभ दिया जा रहा है।

  1. BEE से सीधे क्रेडिट खरीदना: यदि कोई कंपनी लक्ष्य पूरा नहीं कर पाती है, तो वह ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ (BEE) से निर्धारित कीमतों (₹2500 से ₹4500 प्रति ग्राम CO2/km) पर सीधे क्रेडिट खरीद सकती है।

समस्या: यह कीमत ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत लगने वाले जुर्माने (लगभग ₹5000) से काफी कम है। इससे कंपनियां तकनीक अपग्रेड करने के बजाय पैसे देकर बचना पसंद करेंगी।

  1. ब्लॉक असेसमेंट (Block Assessment): मूल्यांकन वार्षिक आधार पर न होकर 3 साल और 2 साल के ब्लॉक में होगा, जिससे कंपनियों को अनुपालन में देरी करने का अवसर मिल जाता है।

आर्थिक महत्व

  • उद्योग आगे, नियमन पीछे: ऑटोमोबाइल उद्योग पहले से ही 2030 तक 20-30% EV बिक्री का स्वैच्छिक लक्ष्य लेकर चल रहा है, जबकि नया नियमन उससे भी कम महत्वाकांक्षी प्रतीत होता है।
  • बाजार को आकार देना: नियमन का काम बाजार को दिशा देना होना चाहिए (जैसे स्पष्ट नीति आने पर CNG का तेजी से विकास हुआ), न कि केवल बाजार की वर्तमान प्राथमिकताओं के अनुकूल होना।
  • रणनीतिक महत्व: CAFE मानदंडों को मजबूत करना केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, मुद्रास्फीति रोकने और भारत की ऊर्जा-सुरक्षा रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा (PT) अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत में प्रस्तावित ‘कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी’ (CAFE) III मानदंडों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. CAFE मानदंड किसी निर्माता के पूरे यात्री वाहन बेड़े (Fleet) के बजाय उसके प्रत्येक व्यक्तिगत वाहन मॉडल (Individual model) के लिए ईंधन-दक्षता लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
  2. प्रस्तावित CAFE III ढांचे के तहत, वाहन निर्माता अपनी कमी को पूरा करने के लिए ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ (BEE) से प्रशासनिक रूप से निर्धारित कीमतों पर अनुपालन क्रेडिट (compliance credits) खरीद सकते हैं।
  3. सीएएफई (CAFE) मानदंडों के अंतर्गत ‘सुपर क्रेडिट’ का लाभ केवल पूर्णतः बैटरी चालित इलेक्ट्रिक वाहनों (BEVs) को ही मिलता है, हाइब्रिड वाहनों को नहीं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) केवल 2

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: CAFE मानदंड व्यक्तिगत मॉडल के बजाय निर्माता के पूरे यात्री वाहन बेड़े (Fleet) के वार्षिक बिक्री-भारित औसत ईंधन-दक्षता लक्ष्य निर्धारित करते हैं।
  • कथन 2 सही है: नए ड्राफ्ट के अनुसार, निर्माता घाटा रहने पर BEE से सीधे निर्धारित कीमत पर अनुपालन क्रेडिट खरीद सकते हैं, जो इसे अंतिम विकल्प (Seller of last resort) बनाता है।
  • कथन 3 गलत है: ड्राफ्ट में ‘सुपर क्रेडिट’ का लाभ बैटरी EV के साथ-साथ प्लग-इन हाइब्रिड, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को भी दिया गया है।

UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “भारत में प्रस्तावित कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी (CAFE) III मानदंडों में शामिल लचीलेपन (flexibilities) के प्रावधान, देश के कम-कार्बन गतिशीलता (low-carbon mobility) और ऊर्जा सुरक्षा के लक्ष्यों को गति देने के बजाय धीमा कर सकते हैं।” इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर की रूपरेखा (Approach):

  • प्रस्तावना (Introduction): CAFE मानदंडों को संक्षेप में परिभाषित करें। बताएं कि हाल ही में ऊर्जा मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित CAFE-III का लक्ष्य 2031-32 तक उत्सर्जन को 77 gCO2/km तक कम करना है।
  • मुख्य भाग (Body):
    • लचीलेपन के प्रावधान और उनकी आलोचना (Dilution of Stringency):
      1. BEE से क्रेडिट की खरीद: पेनाल्टी (जुर्माने) से कम कीमत पर क्रेडिट उपलब्ध कराना कंपनियों को R&D में निवेश के बजाय पैसे देकर अनुपालन करने के लिए प्रेरित करेगा।
      2. सुपर क्रेडिट लूपहोल: हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल को ज्यादा वेटेज मिलने से निर्माता कम वास्तविक EV बनाकर भी नियम का पालन कर लेंगे।
      3. एकाधिक वर्षों का मूल्यांकन (Block assessment): इससे अनुपालन में ढिलाई आएगी।
      4. इथेनॉल और कार्बन न्यूट्रैलिटी: इथेनॉल के माइलेज और लंबी अवधि की नीति को लेकर अनिश्चितता।
    • ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव: भारत का भारी आयातित कच्चा तेल बिल, भू-राजनीतिक झटके और चीन का सफल उदाहरण (NEV क्रेडिट सिस्टम) जहाँ सख्त नियमन ने बाजार को बदल दिया।
  • निष्कर्ष (Conclusion): भारत को ‘अनुपालन (Compliance)’ से आगे बढ़कर ‘परिवर्तन (Transformation)’ पर ध्यान देना चाहिए। नियमन को ऐसा होना चाहिए जो बाजार का नेतृत्व करे (जैसा कि उद्योग 2030 तक 20-30% EV का लक्ष्य खुद रख रहे हैं)। इसे भारत की ऊर्जा-सुरक्षा रणनीति और ‘पंचामृत’ लक्ष्यों के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

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