सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026

लोकसभा में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026

विषय: राजव्यवस्था एवं शासन (सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र- II)

हाल ही में, लोकसभा में ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पेश किया गया। इस विधेयक का उद्देश्य वर्ष 2024 में पारित मूल ‘एंटी-पेपर लीक कानून’ (Anti-paper leak law) को और अधिक सख्त बनाना है, ताकि संगठित परीक्षा अपराधों पर लगाम लगाई जा सके। हालांकि, विपक्ष ने इसे 2024 के कानून की “विफलता की स्वीकारोक्ति” करार दिया है।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • कठोर दंड (Stricter Punishment): विधेयक में पेपर लीक और अनुचित साधनों के प्रयोग के दोषियों के लिए दंड को बढ़ाकर 10 साल तक की कैद और ₹50 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
  • विशेष फास्ट ट्रैक अदालतें (Special Fast Track Courts): परीक्षा से संबंधित अपराधों की त्वरित सुनवाई और निपटारे के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की जाएगी। (सरकार ने इसके लिए कदम उठाना शुरू कर दिया है)।
  • समयबद्ध जांच और सुनवाई (Timebound Process):
    • जांच प्रक्रिया को 2 महीने के भीतर पूरा किया जाना अनिवार्य होगा।
    • आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल होने की तारीख से 3 महीने के भीतर ट्रायल (सुनवाई) पूरा करना होगा।
  • विशेष कार्य बल (Special Task Force – STF): यह विधेयक केंद्र सरकार को अधिकार देता है कि वह इस अधिनियम के तहत अपराधों की जांच के लिए गठित ‘विशेष कार्य बल’ (STF) को मामले सौंप सके।

चिंताएं और आलोचना

  • विफलता की स्वीकारोक्ति: विपक्ष का तर्क है कि यदि 2024 का मूल कानून ‘ऐतिहासिक’ था, तो मात्र दो वर्षों के भीतर इतने बड़े संशोधनों की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह मूल कानून की विफलता को दर्शाता है।
  • संरचनात्मक सुधारों की कमी: केवल कठोर सजा देने से समस्या खत्म नहीं होगी। शिक्षा और परीक्षा प्रणाली (जैसे- NTA की कार्यप्रणाली) में गहरी संरचनात्मक खामियां हैं, जिन्हें दूर किए बिना पेपर लीक नहीं रुकेंगे।
  • NTA और जवाबदेही पर सवाल: विपक्ष ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली और 2024 में गठित के. राधाकृष्णन समिति’ की सिफारिशों के कार्यान्वयन पर सवाल उठाए। (विपक्ष ने NTA के स्वीकृत पदों और हटाए गए अधिकारियों की संख्या में विसंगति का भी मुद्दा उठाया)।
  • कानूनी प्रक्रिया की अप्रभावशीलता: 2024 के NEET-UG पेपर लीक मामले में 45 में से 44 आरोपियों को जमानत मिलने का हवाला देते हुए वर्तमान कानूनी प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाया गया।

पिछले 20 वर्षों में हुए प्रमुख पेपर लीक

भारत में पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों में इसने एक ‘संगठित अपराध’ (Organised Crime) का रूप ले लिया है। कुछ प्रमुख घटनाएं इस प्रकार हैं:

  • व्यापमं घोटाला (Vyapam Scam, मध्य प्रदेश – 2013 से उजागर): यह भारत के इतिहास के सबसे बड़े शैक्षिक और भर्ती घोटालों में से एक था, जिसमें पीएमटी (PMT) और राज्य की कई सरकारी भर्तियों में बड़े पैमाने पर धांधली और पेपर लीक हुए।
  • SSC CGL पेपर लीक (2017): कर्मचारी चयन आयोग (SSC) की परीक्षा में बड़े पैमाने पर तकनीकी सेंधमारी और पेपर लीक के आरोप लगे, जिसके कारण दिल्ली में हफ्तों तक छात्रों का भारी विरोध प्रदर्शन हुआ था।
  • CBSE बोर्ड परीक्षा (2018): 10वीं कक्षा का गणित और 12वीं कक्षा का अर्थशास्त्र का पेपर लीक हुआ, जिससे लाखों स्कूली छात्रों को मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा।
  • राज्य स्तरीय भर्ती परीक्षाएं:
    • राजस्थान: REET (2021) और पुलिस कांस्टेबल भर्ती में लगातार पेपर लीक होने से राज्य में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना।
    • उत्तर प्रदेश: UPTET (2021) और हाल ही में यूपी पुलिस कांस्टेबल परीक्षा (2024) का पेपर लीक होना।
    • बिहार: BPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (2022) का प्रश्न पत्र लीक होना।
  • राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं (2024): NEET-UG (2024) और UGC-NET परीक्षाओं में व्यापक अनियमितताओं और पेपर लीक ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ही केंद्र सरकार को 2024 का नया कानून और अब 2026 का संशोधन लाना पड़ा।

सरकार द्वारा इस समस्या के समाधान के लिए उठाए गए कदम

  • सख्त कानूनी ढांचा (Strict Legal Framework):
    • केंद्र सरकार ने ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024’ लागू किया और अब 2026 के संशोधन के माध्यम से 10 साल की सजा, ₹50 लाख का जुर्माना और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसे कड़े प्रावधान किए जा रहे हैं।
    • इसके अलावा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे कई राज्यों ने आजीवन कारावास और संपत्ति कुर्क करने जैसे सख्त राज्य-स्तरीय कानून बनाए हैं।
  • संस्थागत सुधार (Institutional Reforms):
    • शिक्षा मंत्रालय ने NTA (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) की कार्यप्रणाली में सुधार, डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल और परीक्षा प्रक्रिया की समीक्षा के लिए डॉ. के. राधाकृष्णन समिति’ का गठन किया।
  • तकनीकी उपाय (Technological Measures):
    • ओएमआर (OMR) आधारित ऑफलाइन परीक्षाओं के बजाय कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) को बढ़ावा दिया जा रहा है।
    • डमी उम्मीदवारों को रोकने के लिए परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण (आधार-बेस्ड), आइरिस स्कैनिंग (Iris scanning), जैमर (Jammers) और CCTV निगरानी अनिवार्य की गई है।
  • जांच और प्रवर्तन (Investigation & Enforcement):
    • मामलों की गंभीरता को देखते हुए बड़े मामलों (जैसे NEET 2024) की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई।
    • कई राज्यों में पेपर लीक माफिया से निपटने के लिए विशेष ‘स्पेशल टास्क फोर्स’ (STF) और ‘स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप’ (SOG) का गठन किया गया है।

भविष्य की रणनीति

  • तकनीक का सुरक्षित और उन्नत उपयोग: प्रश्न पत्रों के निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की प्रक्रिया को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा। इसके लिए ‘ब्लॉकचेन तकनीक’ (Blockchain Technology) और ‘एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन’ (End-to-End Encryption) का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि पेपर तभी खुले जब परीक्षा शुरू होने का समय हो।
  • निजी केंद्रों पर निर्भरता कम करना: वर्तमान में NTA और राज्य आयोग थर्ड-पार्टी या निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों को परीक्षा केंद्र बनाते हैं, जहाँ सबसे ज्यादा सेंधमारी होती है। सरकार को परीक्षा आयोजित करने के लिए अपनी स्वयं की सुरक्षित अवसंरचना (Secure infrastructure) का निर्माण करना चाहिए।
  • साइबर इंटेलिजेंस को मजबूत करना: पेपर लीक माफिया अब डार्क वेब (Dark Web) और टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं। इसे रोकने के लिए परीक्षा एजेंसियों के पास एक समर्पित ‘साइबर खुफिया विंग’ (Cyber Intelligence Wing) होनी चाहिए।
  • राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों का कार्यान्वयन: NTA के पुनर्गठन और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) से जुड़ी समिति की सिफारिशों को बिना देरी किए लागू किया जाना चाहिए।
  • सिस्टम का विकेंद्रीकरण (Decentralization): एक ही दिन में लाखों बच्चों की परीक्षा कराने (‘वन नेशन, वन एग्जाम’ मॉडल) के बजाय, परीक्षाओं को कई चरणों में या सुरक्षित विकेंद्रीकृत तरीकों से आयोजित करने पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि एक केंद्र की विफलता पूरे देश की परीक्षा को रद्द न करे।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इसमें परीक्षा से जुड़े अपराधों के लिए अधिकतम 5 वर्ष की कैद और ₹20 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।
  2. विधेयक में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल होने के 3 महीने के भीतर न्यायिक सुनवाई (Trial) पूरी करने का प्रावधान किया गया है।
  3. यह अधिनियम अपराधों की जांच के लिए केंद्र सरकार को मामलों को ‘विशेष कार्य बल’ (STF) को सौंपने का अधिकार देता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b) केवल 2 और 3

व्याख्या:

  • कथन 1 गलत है: 2026 के संशोधन विधेयक के तहत दंड को और अधिक कठोर करते हुए इसे अधिकतम 10 वर्ष की कैद और ₹50 लाख तक का जुर्माना कर दिया गया है।
  • कथन 2 सही है: त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए जांच 2 महीने में और ट्रायल 3 महीने में पूरा करने का समयबद्ध प्रावधान है।
  • कथन 3 सही है: केंद्र को मामलों की जांच ‘विशेष कार्य बल’ (STF) को सौंपने का अधिकार दिया गया है।

UPSC मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: “सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अनुचित साधनों के प्रयोग की समस्या केवल कठोर दंडात्मक कानूनों से हल नहीं की जा सकती; इसके लिए परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं में व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।” ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर की रूपरेखा (Approach):

  • प्रस्तावना (Introduction): सार्वजनिक परीक्षाओं की शुचिता के महत्व को बताते हुए हाल ही में संसद में पेश किए गए 2026 के संशोधन विधेयक का संक्षेप में उल्लेख करें (जैसे- 10 साल की सजा, फास्ट ट्रैक कोर्ट)।
  • मुख्य भाग 1 (कठोर दंडात्मक कानूनों की आवश्यकता क्यों?): बताएं कि संगठित परीक्षा माफिया (Organised crime rings) में भय पैदा करने (Deterrence) और समयबद्ध न्याय (2 महीने में जांच, 3 महीने में ट्रायल) के लिए कड़े कानून आवश्यक हैं।
  • मुख्य भाग 2 (केवल दंडात्मक कानून पर्याप्त क्यों नहीं हैं? / संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता):
    • 2024 के मूल कानून के बावजूद पेपर लीक जारी रहना दर्शाता है कि संस्थागत स्तर पर कमियां हैं।
    • NTA जैसी संस्थाओं में क्षमता (Capacity) और पारदर्शिता का अभाव।
    • परीक्षा केंद्रों का निजीकरण और साइबर सुरक्षा/तकनीकी खामियां।
    • के. राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों का उल्लेख करें (जैसे- डेटा सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों का कड़ा ऑडिट, मानक संचालन प्रक्रिया – SOP)।
  • निष्कर्ष (Conclusion): स्पष्ट करें कि मजबूत कानून एक ढाल की तरह हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए दंडात्मक उपायों के साथ-साथ तकनीकी उन्नयन (Technology upgradation) और जवाबदेह संस्थागत तंत्र (Accountable institutional mechanism) का होना अपरिहार्य है, ताकि युवाओं का व्यवस्था में विश्वास बहाल हो सके।

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