वायु प्रदूषण: सौर ऊर्जा उत्पादन की राह में बाधा

वीकरणीय ऊर्जा का विभिन्न स्रोतों से उत्पादन

‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ (Nature Sustainability) पत्रिका में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषण ने सौर ऊर्जा उत्पादन पर वायु प्रदूषण, विशेष रूप से एरोसोल (aerosols) के गंभीर प्रभाव को उजागर किया है। अध्ययन से पता चलता है कि एरोसोल-प्रेरित प्रदूषण ने वर्ष 2023 में सौर ऊर्जा उत्पादन को महत्वपूर्ण रूप से नुकसान पहुँचाया है, जो भारत के पर्यावरणीय और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्यों के सामने एक दोहरी चुनौती खड़ा करता है।

अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

  • भारत का ‘सौर जुर्माना’ (Solar Penalty): वर्ष 2023 में, एरोसोल ने भारत के सौर ऊर्जा उत्पादन को 9.6% (लगभग 15 टेरावॉट-घंटे या TWh) तक कम कर दिया। प्रतिशत के मामले में यह नुकसान वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक है।
  • वैश्विक प्रभाव: इस मामले में वैश्विक औसत नुकसान 5.8% रहा। वर्ष 2017 और 2023 के बीच, प्रदूषण के कारण मौजूदा सौर बुनियादी ढांचे को औसतन 74 TWh वार्षिक का नुकसान हुआ—जो दुनिया भर में हर साल जोड़ी जाने वाली नई सौर क्षमता से उत्पन्न बिजली के लगभग एक-तिहाई के बराबर है।
  • भारत में क्षेत्रीय असमानता: भारत के भीतर बिजली उत्पादन क्षमता का सबसे अधिक नुकसान इसके अत्यधिक प्रदूषित उत्तरी क्षेत्रों (Northern Regions) में केंद्रित देखा गया।

तुलनात्मक विश्लेषण: भारत बनाम चीन

चीन इस समस्या के विशाल पैमाने और इसके एक व्यावहारिक तकनीकी समाधान, दोनों को एक साथ प्रदर्शित करता है:

  • पूर्ण बनाम सापेक्ष हानि (Absolute vs. Relative Loss): चीन ने बड़े पैमाने पर सौर बिजली (793.5 TWh) का उत्पादन किया, लेकिन पूर्ण मात्रा (absolute terms) के मामले में उसने सबसे अधिक ऊर्जा (61.3 TWh) खो दी। हालांकि, अपने कुल उत्पादन के एक हिस्से के रूप में, उसका नुकसान 7.7% था (जो भारत के 9.6% से कम है)।
  • नजदीकी का मुद्दा (The Proximity Issue): चीन के कई विशाल सौर फार्म पारंपरिक कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के 30 किमी के भीतर स्थित हैं, जिससे वे सीधे तौर पर उच्च-घनत्व वाले प्रदूषण की चपेट में आ जाते हैं।
  • चीन की शमन रणनीति (Mitigation Strategy): अपनी कोयला बिजली क्षमता का विस्तार करने के बावजूद, चीन ने 2013 से 2023 के बीच प्रदूषण से होने वाले सौर नुकसान को सालाना लगभग 1.4% कम करने में सफलता हासिल की। यह कोयला संयंत्रों में उच्च दक्षता वाले फिल्टर लगाकर (retrofitting) किया गया था।

तकनीकी हस्तक्षेप और भारत का नीतिगत रुख

  • फ़्लू-गैस डिसल्फराइज़ेशन (Flue-Gas Desulphurisation – FGD): यह चीन द्वारा उपयोग की जाने वाली मुख्य तकनीक है। FGD प्रणालियों को थर्मल पावर प्लांटों में लगाया जाता है ताकि वायुमंडल में छोड़े जाने से पहले निकास गैसों में से सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और पार्टिकुलेट मैटर (कणिकीय पदार्थ) को साफ़ करके हटाया जा सके।
  • भारत में गतिहीनता (Stagnation): चीन के विपरीत, भारत में एरोसोल-प्रेरित सौर उत्पादन का नुकसान 2013 से 2023 तक पूरी तरह से स्थिर (flat) बना रहा।
  • नीतिगत ढील (2025): तकनीकी शमन को तेज करने के बजाय, भारत सरकार ने 2025 में FGD इकाइयों को स्थापित करने के आदेश को काफी कमजोर कर दिया। यह अनिवार्यता अब मुख्य रूप से बड़े शहरों के पास के कोयला संयंत्रों तक सीमित कर दी गई है और गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में केस-दर-केस आधार पर लागू की जा रही है, जिससे भविष्य की सौर दक्षता खतरे में पड़ गई है।

एरोसोल क्या हैं?

एरोसोल वायुमंडल में तैरते हुए अत्यंत सूक्ष्म ठोस कण या तरल बूंदें होते हैं।

  • प्राकृतिक स्रोत: धूल भरी आंधियां, समुद्री नमक, ज्वालामुखीय राख और जंगलों की आग।
  • मानव-निर्मित (एंथ्रोपोजेनिक) स्रोत: जीवाश्म ईंधन के दहन से होने वाला उत्सर्जन (जैसे कोयला बिजली संयंत्रों से निकलने वाला सल्फेट), बायोमास (जैवभार) जलाने से निकलने वाला ब्लैक कार्बन, वाहनों का धुआं और औद्योगिक धूल।
  • व्यवहार: अपनी संरचना के आधार पर, एरोसोल या तो गर्मी को अवशोषित कर सकते हैं (जैसे ब्लैक कार्बन) या सूर्य की रोशनी को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर सकते हैं (जैसे सल्फेट)।

एरोसोल सौर ऊर्जा को कैसे प्रभावित करते हैं?

एरोसोल तीन प्राथमिक प्रणालियों के माध्यम से सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करते हैं:

  1. प्रत्यक्ष धुंध प्रभाव (Direct Dimming Effect): हवा में निलंबित एरोसोल आने वाले सौर विकिरण (Global Horizontal Irradiance) को अवशोषित और बिखेर देते हैं। यह सौर फोटोवोल्टिक (PV) पैनलों तक पहुँचने वाले फोटॉनों की संख्या को भौतिक रूप से कम कर देता है, जिससे उनकी बिजली उत्पादन क्षमता घट जाती है।
  2. मैल जमाव प्रभाव (Soiling Effect): मोटे एरोसोल (धूल, कालिख) अंततः सौर पैनलों की सतह पर बैठ जाते हैं। यह भौतिक परत सूर्य की रोशनी को रोकती है और इसके कारण बार-बार सफाई की आवश्यकता होती है, जिससे विशेष रूप से राजस्थान और गुजरात जैसे शुष्क क्षेत्रों में परिचालन और रखरखाव (O&M) की लागत काफी बढ़ जाती计।
  3. अप्रत्यक्ष बादल प्रभाव (Indirect Cloud Effect): एरोसोल ‘क्लाउड कंडेनसेशन न्यूक्लियाई’ (CCN) के रूप में कार्य करते हैं। एरोसोल की अत्यधिक मात्रा बादलों के निर्माण को बदल सकती है, जिससे अधिक घने और लंबे समय तक टिकने वाले बादल बनते हैं जो जमीन तक पहुँचने वाली धूप को और ज्यादा रोकते हैं।

सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की पहल

2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के अपने महत्वाकांक्षी ‘पंचामृत’ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं:

  • पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना: हाल ही में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य छत पर सौर पैनल (rooftop solar) लगाने के लिए भारी सब्सिडी प्रदान करके 1 करोड़ घरों को सौर ऊर्जा से जोड़ना है, जिसका लक्ष्य प्रति माह 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देना है।
  • पीएम-कुसुम (PM-KUSUM): किसानों के लिए ग्रिड-कनेक्टेड सौर ऊर्जा संयंत्रों और ऑफ-ग्रिड सौर जल पंपों को सब्सिडी देकर कृषि क्षेत्र को डीजल-मुक्त बनाने का लक्ष्य रखता है।
  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: ‘उच्च दक्षता वाले सौर पीवी मॉड्यूल पर राष्ट्रीय कार्यक्रम’ का उद्देश्य आयातित सौर सेल और वेफर्स पर निर्भरता को कम करते हुए एक मजबूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
  • सोलर पार्क योजना: भूमि और ट्रांसमिशन बुनियादी ढांचा प्रदान करके बड़े पैमाने पर ‘अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट्स’ के निर्माण को सुगम बनाती है (जैसे राजस्थान में भड़ला सोलर पार्क, जो दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क है)।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): गुरुग्राम में मुख्यालय वाला एक भारतीय नेतृत्व वाला वैश्विक प्रयास है, जिसका उद्देश्य कर्क और मकर रेखा के बीच स्थित धूप से समृद्ध देशों में सौर ऊर्जा की तैनाती के लिए निवेश और तकनीक को जुटाना है।

भारत के लिए सौर ऊर्जा का महत्व

  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85% और अपने कोयले का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। सौर ऊर्जा एक घरेलू, अटूट संसाधन है जो अर्थव्यवस्था को वैश्विक भू-राजनीतिक झटकों और ईंधन की अस्थिर कीमतों से सुरक्षित रखता है।
  • जलवायु प्रतिबद्धताएं: सौर ऊर्जा को अपनाना भारत के ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDC) का मुख्य आधार है, जिसके तहत 2030 तक अपनी जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता को 45% कम करना और 2070 तक नेट-जीरो (शुद्ध-शून्य) उत्सर्जन हासिल करना शामिल है।
  • विकेंद्रीकृत ऊर्जा पहुँच: सौर माइक्रो-ग्रिड और ऑफ-ग्रिड समाधान उन दूरदराज के, पहाड़ी या ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से बिजली पहुँचा सकते हैं जहाँ राष्ट्रीय ग्रिड का विस्तार करना आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है।
  • आर्थिक व्यवहार्यता: पिछले दशक में सौर ऊर्जा की समतुल्य लागत (LCOE) में भारी गिरावट आई है, जिससे यह नए कोयला संयंत्रों की तुलना में सस्ती हो गई है। यह हरित नौकरियों (green jobs) के निर्माण की भी भारी क्षमता रखती है।

सौर ऊर्जा पर पूरी तरह से निर्भर होने की चुनौतियाँ

  • अनिरंतरता और भंडारण की कमी (Intermittency & Lack of Storage): सौर ऊर्जा गैर-प्रेषणीय (non-dispatchable) है; यह केवल दिन के समय उत्पन्न होती है। वर्तमान में, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) और पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) काफी महंगे हैं, जिससे बेसलोड कोयला बिजली के बिना शाम की चरम मांग (peak demand) को पूरा करना मुश्किल हो जाता है।
  • आयात पर निर्भरता: पीएलआई (PLI) योजना के बावजूद, भारत अभी भी पॉलीसिलिकॉन, इनगॉट्स और सोलर वेफर्स जैसे अपस्ट्रीम घटकों के लिए मुख्य रूप से चीन पर निर्भर है।
  • भूमि अधिग्रहण: उपयोगिता-पैमाने (utility-scale) के सौर संयंत्रों के लिए बड़े पैमाने पर निरंतर, छाया-मुक्त भूमि की आवश्यकता होती है। इससे अक्सर कृषि भूमि पर टकराव या पर्यावरणीय चिंताएं पैदा होती हैं (जैसे राजस्थान में गंभीर रूप से संकटग्रस्त ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ पक्षी के लिए ओवरहेड ट्रांसमिशन लाइनों का खतरा)।
  • ग्रिड एकीकरण की बाधाएं: भारत के पुराने बिजली ग्रिडों में बिना किसी व्यवधान के परिवर्तनशील नवीकरणीय ऊर्जा के भारी और अचानक आने वाले प्रवाह को संभालने के लचीलेपन की कमी है।
  • पर्यावरणीय प्रतिकूल परिस्थितियाँ: जैसा कि नेचर सस्टेनेबिलिटी के अध्ययन में कहा गया है, अत्यधिक एरोसोल प्रदूषण, बदलते मानसून के पैटर्न और चरम मौसम की घटनाएं (जैसे चक्रवातों से तटीय पैनलों को नुकसान) दीर्घकालिक ऊर्जा उत्पादन को खतरे में डालते हैं।

भविष्य की रणनीति

  • नीतिगत तालमेल (ऊर्जा + पर्यावरण): भारत हवा को प्रदूषित छोड़कर हरित ऊर्जा के लक्ष्य का पीछा नहीं कर सकता। सौर उत्पादन की रक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम’ (NCAP) के तहत कोयला संयंत्रों में फ़्लू-गैस डिसल्फराइज़ेशन (FGD) की स्थापना जैसे आदेशों को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।
  • ऊर्जा भंडारण को गति देना: सरकार को घरेलू बैटरी विनिर्माण को सब्सिडी देनी चाहिए (एडवांस्ड केमिस्ट्री सेल PLI के माध्यम से) और अनिरंतरता की समस्या को हल करने के लिए बड़े पैमाने पर पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP) के लिए उपयुक्त क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए।
  • एग्रीवोल्टिक्स (Agrivoltaics) को बढ़ावा देना: भूमि विवादों को सुलझाने के लिए, सौर पैनलों को कृषि के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए (फसलों के ऊपर पैनल लगाना) या जलाशयों पर फ्लोटिंग सोलर के रूप में तैनात किया जाना चाहिए।
  • ग्रिड का आधुनिकीकरण: ऐसे स्मार्ट ग्रिड में निवेश करें जो सौर उत्पादन का पूर्वानुमान लगाने और रीयल-टाइम मांग-आपूर्ति के मिलान को कुशलतापूर्वक प्रबंधित करने के लिए एआई (AI) और मशीन लर्निंग का उपयोग करते हैं।

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन पर वायु प्रदूषण के प्रभाव के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. वायुमंडल में निलंबित एरोसोल स्थलीय विकिरण (terrestrial radiation) को रोककर सौर फोटोवोल्टिक (PV) उत्पादन को बढ़ाते हैं।
  2. फ़्लू-गैस डिसल्फराइज़ेशन (FGD) कोयला बिजली संयंत्रों में उत्सर्जन से सल्फर डाइऑक्साइड को हटाने के लिए उपयोग की जाने वाली एक तकनीक है।
  3. भारत में हालिया संशोधनों ने देश भर के सभी परिचालन कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में बिना किसी अपवाद के FGD इकाइयों की स्थापना को अनिवार्य कर दिया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

स्पष्टीकरण:

  • कथन 1 गलत है: एरोसोल आने वाले सौर विकिरण को अवरुद्ध करते हैं, जिससे सौर पीवी पैनलों की दक्षता कम हो जाती है।
  • कथन 2 सही है: फ़्लू गैस से $SO_2$ को हटाने के लिए FGD एक मानक तकनीक है।
  • कथन 3 गलत है: 2025 में, भारत सरकार ने देशव्यापी अनिवार्य आदेश के बजाय इसे केवल बड़े शहरों के पास के संयंत्रों या गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों में केस-दर-केस आधार पर सीमित करके FGD मानदंडों को शिथिल कर दिया था।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “वायु प्रदूषण केवल एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट नहीं है; यह भारत के नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण के खिलाफ एक सीधा अवरोधक भी है।” इस कथन के आलोक में विश्लेषण कीजिए कि एरोसोल प्रदूषण सौर ऊर्जा उत्पादन को कैसे प्रभावित करता है। वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की तुलना में थर्मल पावर प्लांट उत्सर्जन को कम करने में भारत की नीतिगत प्रतिक्रियाओं का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

मुख्य परीक्षा के लिए संक्षिप्त दृष्टिकोण:

  • भूमिका: भारत के हरित संक्रमण के दोहरे उद्देश्यों (सौर क्षमता का विस्तार करते हुए उत्सर्जन को कम करना) को रेखांकित करें और हालिया ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ अध्ययन के संदर्भ को प्रस्तुत करें।
  • मुख्य भाग – भाग 1 (एरोसोल का प्रभाव): सौर पैनलों पर पड़ने वाले प्रभाव की कार्यप्रणाली (धूप को बिखेरना/अवशोषित करना) को समझाएं। आर्थिक और ऊर्जा नुकसान को दर्शाने के लिए प्रासंगिक डेटा (जैसे भारत में 9.6% की कमी, उत्तर भारत में उच्च प्रभाव) का उपयोग करें।
  • मुख्य भाग – भाग 2 (वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएं बनाम भारत): चीन के सक्रिय दृष्टिकोण (कोयला संयंत्रों को FGDs से लैस करना, जिसके परिणामस्वरूप सौर नुकसान में 1.4% की वार्षिक कमी आई) की तुलना भारत की स्थिर नुकसान दर और हाल ही में 2025 में FGD स्थापना लक्ष्यों में दी गई ढील से करें।
  • निष्कर्ष: एक एकीकृत नीतिगत ढांचे की आवश्यकता के साथ निष्कर्ष निकालें, जहाँ पर्यावरण नियमन (जैसे राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम) और ऊर्जा सुरक्षा लक्ष्य (सौर क्षमता में वृद्धि) अलग-अलग काम करने के बजाय एक साथ मिलकर काम करें।

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