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हाल ही में, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और उनके इंडोनेशियाई समकक्ष सुगियानो ने नई दिल्ली में 8वीं भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आयोग (India-Indonesia Joint Commission) बैठक की सह-अध्यक्षता की।
- चार वर्षों का अंतराल: यह बैठक चार साल के लंबे अंतराल (पिछली बैठक 2022 में हुई थी) के बाद आयोजित हुई है।
- महत्व: यह बैठक आगामी कुछ हफ्तों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जकार्ता (इंडोनेशिया) की द्विपक्षीय यात्रा के लिए एक मजबूत ‘कर्टेन-रेज़र’ (तैयारी) के रूप में कार्य करती है।
- कूटनीतिक चक्र की पूर्णता: जनवरी 2025 में, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। पीएम मोदी की आगामी जकार्ता यात्रा इसी का आधिकारिक पारस्परिक उत्तर (Reciprocal Visit) है।
प्रमुख सहयोग क्षेत्र
दोनों देशों ने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए 12 महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग का खाका तैयार किया है, जिन्हें मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन रणनीतिक सहयोग स्तंभों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
- स्तंभ 1: रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा
- संयुक्त गश्त (Joint Patrols): हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) समुद्री लेन में दोनों देशों द्वारा संयुक्त गश्त को बढ़ावा देना।
- सुरक्षा समन्वय: क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आपसी सुरक्षा तालमेल और समन्वय को और मजबूत करना।
- स्तंभ 2: व्यापार, निवेश एवं ऊर्जा
- आर्थिक गलियारे: दोनों देशों के बीच व्यापार को सुगम बनाने के लिए आर्थिक गलियारों को सुव्यवस्थित और व्यवस्थित करना।
- सतत ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition): पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ ऊर्जा के क्षेत्र में एक-दूसरे का सहयोग करना।
- स्तंभ 3: डिजिटल, फार्मा एवं अंतरिक्ष
- डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भारत के सफल डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे (जैसे- UPI, डिजिटल पहचान आदि) के अनुभवों का लाभ उठाना।
- फार्मा और अंतरिक्ष अन्वेषण: चिकित्सा (Pharma) के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और अंतरिक्ष (Space Science) अनुसंधान में संयुक्त क्षमताओं का विस्तार करना।
वैश्विक और क्षेत्रीय मंचों पर संरेखण
- ग्लोबल साउथ की आवाज: ‘ग्लोबल साउथ’ में महत्वपूर्ण प्रभाव रखने वाली दो बड़ी ‘मध्यम शक्तियों’ (Middle Powers) के रूप में, दोनों देशों ने वैश्विक संकटों पर अपने विचारों को साझा किया।
- बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग: दोनों देशों ने क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए आसियान (ASEAN) और जी-20 (G20) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर आपसी समन्वय को और कड़ा करने की प्रतिबद्धता जताई।
- ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का सुदृढ़ीकरण: यह रणनीतिक तालमेल भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति और हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) विज़न को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।

भारत-इंडोनेशिया संबंध: ऐतिहासिक से वर्तमान
- प्राचीन और सांस्कृतिक जुड़ाव: दोनों देशों के बीच संबंध 2000 वर्षों से अधिक पुराने हैं। कलिंग (वर्तमान ओडिशा) और दक्षिण भारत (चोल साम्राज्य) के व्यापारियों ने इंडोनेशिया के साथ गहरे व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे। रामायण और महाभारत का इंडोनेशियाई संस्कृति (जैसे- ‘वायंग’ कठपुतली नाटक) और वास्तुकला (जैसे- प्रम्बानन मंदिर) पर गहरा प्रभाव है।
- स्वतंत्रता के बाद (गुटनिरपेक्ष आंदोलन): भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो ने 1955 के ऐतिहासिक बांडुंग सम्मेलन (Bandung Conference) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) की नींव रखी।
- वर्तमान कूटनीतिक विकास:
- 2005 में स्थापित ‘रणनीतिक साझेदारी’ को 2018 में ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ (Comprehensive Strategic Partnership) में अपग्रेड किया गया।
- भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति और ‘सागर’ (SAGAR – Security and Growth for All in the Region) विज़न इंडोनेशिया की ‘ग्लोबल मैरीटाइम फुलक्रम’ (Global Maritime Fulcrum) नीति के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाते हैं।
दोनों देशों के मध्य संबंध का महत्व
- भू-रणनीतिक महत्व (Geostrategic Importance): इंडोनेशिया मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स (Chokepoints) को नियंत्रित करता है। हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भारत के लिए इंडोनेशिया का सहयोग अपरिहार्य है।
- आर्थिक साझेदारी: इंडोनेशिया आसियान (ASEAN) क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। भारत इंडोनेशिया से पाम ऑयल (Palm Oil) और कोयले का एक प्रमुख आयातक है, जो भारत की खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
- समुद्री सुरक्षा और रक्षा: दोनों देश अंडमान सागर में संयुक्त गश्त (CORPAT) और ‘समुद्र शक्ति’ (Samudra Shakti) जैसे द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास करते हैं, जो समुद्री डकैती और आतंकवाद को रोकने में मदद करते हैं।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: जी-20 (G20) और संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर विकासशील देशों (Global South) की आवाज़ को मज़बूत करने में दोनों देश समान विचार रखते हैं।
दोनों देशों के मध्य संबंध: चिंताएँ
- बढ़ता व्यापार घाटा (Trade Deficit): द्विपक्षीय व्यापार काफी हद तक इंडोनेशिया के पक्ष में झुका हुआ है, जिसका मुख्य कारण भारत द्वारा भारी मात्रा में कोयले और खाद्य तेलों का आयात है।
- चीन का बढ़ता प्रभाव: इंडोनेशिया में चीन का भारी आर्थिक निवेश (विशेषकर ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ – BRI के तहत) और आसियान में उसकी राजनीतिक पकड़ भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है।
- गैर-टैरिफ बाधाएं (Non-Tariff Barriers): इंडोनेशिया द्वारा लगाए गए कड़े नियामक और गैर-टैरिफ अवरोधों के कारण भारतीय निर्यातकों, विशेषकर फार्मास्यूटिकल्स, कृषि और ऑटोमोबाइल क्षेत्रों को इंडोनेशियाई बाज़ार में प्रवेश करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में देरी: अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे (Aceh) प्रांत के बीच कनेक्टिविटी (विशेषकर सबांग बंदरगाह का विकास) की गति धीमी रही है।
भविष्य की रणनीति
- व्यापार का विविधीकरण: व्यापार घाटे को कम करने के लिए केवल कोयले और पाम ऑयल पर निर्भर रहने के बजाय भारत को आईटी सेवाओं, स्वास्थ्य सेवा (Pharma), और हरित ऊर्जा (Green Energy) के क्षेत्र में निर्यात बढ़ाना चाहिए।
- रक्षा कूटनीति को बढ़ावा: भारत को इंडोनेशिया को ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल, तटीय रडार सिस्टम और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्यात की संभावनाओं को सक्रिय रूप से तलाशना चाहिए।
- बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी: ‘सबांग पोर्ट’ (Sabang Port) के रणनीतिक विकास और अंडमान-आचे कनेक्टिविटी विज़न (Andaman-Aceh Connectivity Vision) को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए।
- लोगों के बीच संपर्क (People-to-People Contact): पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सीधी उड़ानों की संख्या में वृद्धि, शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग और सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
- नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) पर जोर: सतत मत्स्य पालन, समुद्री जैव विविधता संरक्षण और महासागर आधारित नवीकरणीय ऊर्जा में संयुक्त अनुसंधान और निवेश को बढ़ावा देना चाहिए।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रासंगिक प्रश्न
प्रश्न 1. हाल ही में ख़बरों में रहे ‘नई दिल्ली-जकार्ता अक्ष’ (New Delhi-Jakarta axis) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- हाल ही में आयोजित भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आयोग की बैठक ने इन दोनों देशों के बीच पांच साल के गतिरोध को समाप्त किया है।
- जनवरी 2025 में, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।
- भारत और इंडोनेशिया दोनों ही आसियान (ASEAN) और जी-20 (G20) समूह के संस्थापक सदस्य देश हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (b) केवल 2
- व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि यह बैठक 4 साल के अंतराल (2022 के बाद) के बाद हुई है, न कि 5 साल। कथन 2 बिल्कुल सही है (राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो मुख्य अतिथि थे)। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत आसियान (ASEAN) का सदस्य देश है (संवाद भागीदार), लेकिन इसका संस्थापक या पूर्ण सदस्य नहीं है।
मुख्य परीक्षा के लिए प्रासंगिक प्रश्न
प्रश्न. “हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उभरती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच भारत और इंडोनेशिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों का पुनरुद्धार दोनों देशों की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।” हालिया राजनयिक घटनाक्रमों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)
उत्तर की रूपरेखा/संकेत:
- प्रस्तावना: हाल ही में 4 साल के अंतराल के बाद आयोजित 8वीं भारत-इंडोनेशिया संयुक्त आयोग बैठक और जनवरी 2025 में इंडोनेशियाई राष्ट्रपति की भारत यात्रा का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत करें। इसे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के एक मजबूत स्तंभ के रूप में रेखांकित करें।
- रणनीतिक और आर्थिक महत्व (मुख्य भाग):
- समुद्री सुरक्षा और रक्षा: मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के पास स्थित होने के कारण दोनों देशों के लिए इंडो-पैसिफिक समुद्री लेन की सुरक्षा और संयुक्त गश्त (Joint Patrols) का महत्व समझाएं।
- तकनीकी और आर्थिक सहयोग: भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), फार्मास्युटिकल क्षमता और अंतरिक्ष अन्वेषण में बढ़ते सहयोग पर प्रकाश डालें। सतत ऊर्जा संक्रमण और व्यापारिक गलियारों के विकास पर चर्चा करें।
- ग्लोबल साउथ का नेतृत्व: आसियान (ASEAN) और जी-20 (G20) जैसे मंचों पर दोनों देशों द्वारा मध्यम शक्तियों (Middle Powers) के रूप में चीन-अमेरिका ध्रुवीकरण के बीच संतुलन बनाने की भूमिका।
- चुनौतियां: व्यापारिक बाधाएं, क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में सूक्ष्म अंतर (जैसे दक्षिण चीन सागर पर रुख), और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली देरी।
- निष्कर्ष / आगे की राह: ‘न्यू दिल्ली-जकार्ता अक्ष’ को मजबूत करने के लिए समयबद्ध तरीके से आर्थिक और समुद्री समझौतों को धरातल पर उतारने की आवश्यकता पर बल देते हुए एक सकारात्मक निष्कर्ष दें।
