चोल-कालीन अनैमंगलम ताम्रपत्रों की स्वदेश वापसी

चोल-कालीन अनैमंगलम ताम्रपत्र

हाल ही में, भारत के सांस्कृतिक पुनर्प्राप्ति इतिहास में ‘द हेग’ (The Hague) में आयोजित एक औपचारिक समारोह के दौरान एक ऐतिहासिक घटना घटी। नीदरलैंड ने आधिकारिक तौर पर 11वीं शताब्दी के अनैमंगलम ताम्रपत्र शासन/विलेख (जिसे लोकप्रिय रूप से लीडेन ताम्रपत्र – Leiden Copper Plates कहा जाता है) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन की उपस्थिति में भारत को सौंप दिया है।

वर्ष 1862 से लीडेन यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में रखे गए इन शाही शासनों की वापसी ने 14 साल के राजनयिक प्रयासों को सफलतापूर्वक पूरा कर दिया है। यह पहली बार है जब चोल काल के किसी ताम्रपत्र विलेख को वापस भारत लाया गया है।

ऐतिहासिक संदर्भ: श्रीविजय संबंध और धार्मिक बहुलवाद

ये ताम्रपत्र चोल समुद्री साम्राज्य के एक अमूल्य दस्तावेजी संग्रह के रूप में कार्य करते हैं, जो मध्यकालीन हिंद महासागर कूटनीति और आंतरिक धार्मिक सद्भाव में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं:

  • भूमि अनुदान (The Grant): इन अभिलेखों में एक स्थानीय बौद्ध मठ के रखरखाव के लिए अनैमंगलम गांव (नागपट्टिनम बंदरगाह शहर, तमिलनाडु के पास) से प्राप्त होने वाले भूमि राजस्व के आवंटन का विवरण दर्ज है।
  • बौद्ध विहार: चूड़ामणिवर्मन विहार’ (जिसे राजा राजा चोलन पेरुम्पल्ली भी कहा जाता है) नामक इस मठ का निर्माण श्रीविजय साम्राज्य (आधुनिक जावा/सुमात्रा, इंडोनेशिया में केंद्रित) के राजा श्री मार विजयोत्तुंग वर्मन ने अपने पिता श्री चूड़ामणि वर्मन के सम्मान में करवाया था।
  • अंतर-धार्मिक संरक्षण: यह शासन राज्य-प्रायोजित धार्मिक सह-अस्तित्व के एक अनूठे ऐतिहासिक मिसाल पर प्रकाश डालता है। यह रिकॉर्ड करता है कि एक कट्टर शैव (हिंदू) शाही दरबार ने विदेशी दक्षिण-पूर्वी एशियाई राजघराने से जुड़े एक बौद्ध संस्थान को सक्रिय रूप से संरक्षण और सुरक्षा प्रदान की।
  • उत्तराधिकार का सातत्य: यद्यपि सम्राट राजा राजा चोल प्रथम (शासनकाल 985-1014 ईस्वी) ने ताड़ के पत्तों पर दर्ज प्रारंभिक मौखिक आदेश दिया था, लेकिन उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम (शासनकाल 1014-1044 ईस्वी) ने इस आदेश को स्थायी तांबे की चादरों पर उत्कीर्ण करवाकर निष्पादित किया।

लीडेन पत्रों की पुरालेखिकी (Epigraphy) और संरचना

यह संपूर्ण पुरावशेष लगभग 30 किलोग्राम वजनी एक विशाल प्रशासनिक दस्तावेज है, जो संरचनात्मक रूप से दो अलग-अलग कालक्रमों में विभाजित है:

शासन/विलेख की श्रेणीजारी/निष्पादित करने वाला शासकलिपि और भाषा विभाजनप्राथमिक उद्देश्य / विषय-वस्तु
बड़े लीडेन पत्र (21 पत्र)राजेंद्र चोल प्रथम (अपने पिता राजा राजा प्रथम के सम्मान में)5 संस्कृत पत्र और 16 तमिल पत्रयह चोल वंश की दिव्य वंशावली (संस्कृत में) का पता लगाता है और अनैमंगलम गांव की सटीक राजस्व सीमाओं और कृषि छूटों (तमिल में) का विवरण देता है।
छोटे लीडेन पत्र (3 पत्र)कुलोत्तुंग चोल प्रथम (शासनकाल 1070-1120 ईस्वी)पूरी तरह से तमिल लिपियह दो जावानीस दूतों की अपील के बाद बौद्ध संघ को उपहार में दिए गए अतिरिक्त राजस्व बंदोबस्ती (4,500 ‘कलम’ धान) को दर्ज करता है।

प्रतिमा विज्ञान: चोल शाही प्रतीक चिह्न (Royal Insignia)

ये 24 बड़े और छोटे पत्र एक विशाल कांस्य की अंगूठी (रिंग) से आपस में जुड़े हुए हैं, जो चोल शाही मुहर की एक जटिल पिघली हुई धातु की ढलाई द्वारा सुरक्षित है। यह प्रतिमा विज्ञान दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य के आधिपत्य के एक दृश्य राजनीतिक बयान के रूप में कार्य करता है:

  • बाघ (The Tiger): चोल राजवंश के प्राथमिक शाही प्रतीक के रूप में केंद्र में स्थित है।
  • दो मछलियाँ (Two Fish): पराजित पाण्ड्य राजवंश का प्रतिनिधित्व करती हैं।
  • धनुष (The Bow): पराजित चेर राजवंश का प्रतिनिधित्व करता है।
  • सहायक प्रतीक: मुहर को एक शाही छत्र, दो चामर (fly-whisks), तेल के दीपक, एक स्वास्तिक और सम्राट की विजय की प्रशंसा करने वाले एक संक्षिप्त संस्कृत श्लोक से सजाया गया है।

पुरालेखीय महत्व: चेरों और पाण्ड्यों के प्रतीकों को सीधे चोल बाघ के साथ या उसके नीचे रखना दृश्य रूप से यह प्रमाणित करता था कि समकालीन चोल शासकों ने अपने प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को सफलतापूर्वक अपने अधीन कर लिया था।

विवादित विरासत के लिए एक मिसाल

लीडेन ताम्रपत्रों की सफल प्राप्ति भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और विरासत की वापसी के प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बेंचमार्क स्थापित करती है:

  • स्रोत की जांच (Provenance Investigation) का उपयोग: औपनिवेशिक काल की कलाकृतियों की वापसी पर 2022 की डच घरेलू नीति में बदलाव से इस वापसी को गति मिली। स्वतंत्र औपनिवेशिक संग्रह समिति ने निष्कर्ष निकाला कि ये ताम्रपत्र 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तब “अनैच्छिक रूप से खो गए” थे, जब डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) ने नागपट्टिनम पर कब्जा कर लिया था।
  • बहुपक्षीय मंचों पर मजबूती: यह मामला अन्य विवादित अभिलेखों के लिए समान द्विपक्षीय वार्ता की मांग करने के लिए यूनेस्को की अंतर-सरकारी समिति जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत के कानूनी और नैतिक रुख को मजबूत करता है।
  • भविष्य की वापसी को लक्षित करना: इतिहासकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस गति का उपयोग विदेशों में मौजूद अन्य महत्वपूर्ण तमिल शिलालेखों, जैसे कि प्रसिद्ध वेल्विकुडी ताम्रपत्र (पाण्ड्य शासक परांतक नेदुनचदैयान द्वारा जारी), जो वर्तमान में ब्रिटिश संग्रहालय (लंदन) में रखे हुए हैं, की वापसी के दावे के लिए करना चाहते हैं।

चोल राजवंश: एक संक्षिप्त अवलोकन

  • समयरेखा और मुख्य भूगोल: इम्पीरियल चोलों ने 9वीं से 13वीं शताब्दी ईस्वी तक शासन किया। इनका शासन मुख्य रूप से तमिलनाडु के उपजाऊ कावेरी नदी डेल्टा में केंद्रित था, जिसका विस्तार पूरे दक्षिण भारत, श्रीलंका के कुछ हिस्सों और दक्षिण-पूर्वी एशिया तक हुआ।
  • संस्थापक: चोल सत्ता के पुनरुद्धार का नेतृत्व विजयालय चोल (लगभग 850 ईस्वी) ने किया था, जिन्होंने पल्लवों के सामंत मुत्तरैयार प्रमुखों से तंजावुर को छीनकर अपनी राजधानी बनाया था।
  • प्रमुख शासक:
    • राजा राजा चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी): इन्होंने कंदलूर में चेर नौसेना को नष्ट कर दिया, उत्तरी श्रीलंका पर विजय प्राप्त की और एक शक्तिशाली केंद्रीकृत साम्राज्य का सुदृढ़ीकरण किया। उन्होंने तंजावुर में प्रतिष्ठित बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया।
    • राजेंद्र चोल प्रथम (1014-1044 ईस्वी): इन्होंने साम्राज्य का उसके चरम उत्कर्ष तक विस्तार किया। उन्होंने गंगा नदी तक एक सफल सैन्य अभियान का नेतृत्व किया, गंगाईकोंडचोलन” की उपाधि धारण की, एक नई राजधानी (गंगाईकोंडचोलपुरम) का निर्माण किया और व्यापार मार्गों की रक्षा के लिए श्रीविजय साम्राज्य (दक्षिण-पूर्वी एशिया) के खिलाफ एक ऐतिहासिक नौसैनिक हमला शुरू किया।
  • अद्वितीय प्रशासनिक ढांचा: चोल अपने अत्यधिक विकसित स्थानीय स्वशासन के लिए जाने जाते थे। परांतक प्रथम के उत्तरमेरुर अभिलेखों में ग्रामीण सभाओं (‘उर’ और ‘सभा’), लोकतांत्रिक चुनाव प्रणालियों (कुदावोलाई – लॉटरी प्रणाली) और ग्राम समिति के सदस्यों के लिए सख्त योग्यता/अयोग्यता मानदंडों का विस्तृत विवरण मिलता है।

चोलों का सांस्कृतिक महत्व

द्रविड़ वास्तुकला का शिखर

चोल काल रॉक-कट (चट्टानों को काटकर बनाई गई) वास्तुकला से विशाल पत्थर-निर्मित संरचनाओं के संक्रमण का प्रतीक था।

  • विमान (Vimana) पर ध्यान: बाद की विजयनगर या पाण्ड्य शैलियों के विपरीत, जहाँ प्रवेश द्वार (गोपुरम) विशाल हो गए थे, चोल मंदिरों की विशेषता उनके ऊंचे, बहु-स्तरीय ‘विमान’ (गर्भगृह के ऊपर के टॉवर) हैं।
  • यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल: महान चोल मंदिर” (Great Living Chola Temples) श्रृंखला में तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, गंगाईकोंडचोलपुरम का बृहदीश्वर मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर शामिल हैं।

धातु विज्ञान का चरमोत्कर्ष (चोल कांस्य)

‘लॉस्ट-वैक्स’ तकनीक (cire perdue / मोम-गलाकर ढलाई की विधि) का उपयोग करके, चोल मूर्तिकारों ने दुनिया की कुछ बेहतरीन धातु कलाकृतियों का निर्माण किया।

  • इसकी सबसे प्रतिष्ठित रचना नटराज (ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में शिव) है, जो धर्म, विज्ञान और सौंदर्यशास्त्र का समन्वय करती है, तथा सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (माया) और अनुग्रह (मोक्ष) के पांच चक्रों का प्रतीक है।

तमिल साहित्य का स्वर्ण युग

शाही दरबार ने विद्वानों और कवियों को भारी संरक्षण दिया, जिससे कई धर्मनिरपेक्ष और भक्ति कृतियों का निर्माण हुआ:

  • कम्बन की कम्ब रामायणम (रामायण का एक महाकाव्य रूपांतरण)।
  • सेक्किझार का पेरिय पुराणम (63 नयनारों/शैव संतों के जीवन का दस्तावेजीकरण)।
  • जयमकोंदार द्वारा कलिंगत्तु परणि की रचना (कलिंग पर राजेंद्र चोल की विजय का उत्सव)।

समुद्री कूटनीति और वैश्विक व्यापार

चोलों ने बंगाल की खाड़ी को चोल झील” में बदल दिया था। उन्होंने चीन के तांग राजवंश में उच्च स्तरीय राजनयिक और व्यापारिक दूतावास भेजे, सुमात्रा/जावा में समुद्री उपस्थिति बनाए रखी और मणिग्रामम और अय्यावोले-पद्दुम (Ayyavole-five hundred) जैसे शक्तिशाली व्यापारिक संघों (merchant guilds) के माध्यम से हिंद महासागर के व्यापार पर अपना दबदबा बनाया।

प्रबुद्ध धार्मिक बहुलवाद

कट्टर शैव होने के बावजूद, चोल राजाओं ने गहरी धर्मनिरपेक्ष शासन कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने वैष्णव मंदिरों, जैन तीर्थों (पल्लिस) और बौद्ध मठों को व्यापक भूमि और राजस्व अनुदान जारी किए — जैसा कि राजा राजा प्रथम और राजेंद्र प्रथम द्वारा जावानीस श्रीविजय शासकों के लिए बौद्ध चूड़ामणिवर्मन विहार के निर्माण का समर्थन करने से सिद्ध होता है।

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