भारत में बिजली की मांग में रिकॉर्ड बढ़त और संबद्ध चुनौतियाँ

भारत में बिजली की मांग एवं उत्पादन

हाल ही में केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने सूचित किया है कि भीषण गर्मी और लू (heatwaves) के बीच भारत में बिजली की मांग दर्ज की गई है तथा चरम बिजली मांग (peak electricity demand) 271 GW के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई है। जहां एक ओर सरकार ने इसे देश की विद्युत प्रणाली की मजबूती और तैयारी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया है, वहीं दूसरी ओर विभिन्न राज्यों से स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर बिजली कटौती (load shedding) की खबरें सामने आ रही हैं।

भारत में बिजली की मांग में उछाल के मुख्य बिंदु

  • चरम मांग में रिकॉर्ड वृद्धि: 271 GW की यह चरम मांग अभूतपूर्व गर्मी के तनाव और कूलिंग उपकरणों (AC, कूलर आदि) के उपयोग में भारी वृद्धि के कारण है।
  • रिपोर्ट किया गया घाटा बनाम वास्तविक घाटा: ग्रिड-इंडिया (Grid-India) के अनुसार, आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया चरम बिजली घाटा लगभग 1.7 GW था। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि वास्तविक घाटा इससे काफी अधिक है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर होने वाली बिजली कटौती को अक्सर आधिकारिक आंकड़ों में शामिल नहीं किया जाता है।
  • मांग का पूर्वानुमान (Demand Forecasting): ग्रिड-इंडिया द्वारा रिपोर्ट की गई पूर्वानुमान त्रुटि सीमा (forecast error margins) काफी कम है (एक दिन पहले के लिए 4% और वास्तविक समय के लिए ~1%)। इससे पता चलता है कि मांग में यह उछाल अत्यधिक पूर्वानुमानित था, लेकिन फिर भी इसने मौजूदा बुनियादी ढांचे पर भारी तनाव पैदा किया।

पर्याप्त क्षमता के बावजूद बिजली कटौती क्यों?

कागज़ पर भारत की कुल चरम मांग उसकी स्थापित तापीय (thermal) और जलविद्युत (hydroelectric) क्षमता के लगभग बराबर है। इसके बावजूद होने वाली बिजली कटौती के पीछे कई संरचनात्मक और परिचालन संबंधी बाधाएं हैं:

डेटा में विसंगति और असूचित कटौती (Data Disconnect)

  • मैक्रो बनाम माइक्रो मॉनिटरिंग: आधुनिक स्काडा (SCADA – सुपरवाइजरी कंट्रोल एंड डेटा एक्विजिशन) सिस्टम मैक्रो ग्रिड स्तर पर मांग की निगरानी और बिजली का मार्ग निर्धारण करते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर होने वाले व्यवधान अक्सर इनमें दर्ज नहीं हो पाते।
  • जानबूझकर की गई लोड शेडिंग: स्वतंत्र रूप से काम करने वाली बिजली वितरण कंपनियां (Discoms) ग्रिड लोड को प्रबंधित करने के लिए अक्सर जानबूझकर स्थानीय क्षेत्रों की बिजली काट देती हैं। यह दबी हुई मांग (suppressed demand) कभी भी आधिकारिक सार्वजनिक डोमेन में दर्ज नहीं होती।

कमजोर वितरण बुनियादी ढांचा (Weak Distribution Infrastructure)

  • डिस्कॉम्स का वित्तीय संकट: राज्य के स्वामित्व वाली डिस्कॉम्स वित्तीय संकट से जूझ रही हैं, क्योंकि उपभोक्ताओं का एक बड़ा हिस्सा लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ (cost-reflective tariffs) का भुगतान करने में असमर्थ है। केवल लाभदायक क्षेत्रों के निजीकरण ने इन्हें और कमजोर कर दिया है।
  • अपग्रेडेशन का अभाव: धन की कमी के कारण डिस्कॉम्स स्थानीय बुनियादी ढांचे का रखरखाव या आधुनिकीकरण नहीं कर पाती हैं। परिणामस्वरूप, स्थानीय कटौती देशव्यापी उत्पादन घाटे के बजाय ट्रांसफार्मर ट्रिपिंग, मौसम संबंधी खराबी और रखरखाव के कारण होती है।

पारेषण बाधाएं (Transmission Bottlenecks)

  • भले ही भारत एक राष्ट्र, एक ग्रिड” के रूप में काम करता है, फिर भी क्षेत्रीय पारेषण बाधाएं (transmission bottlenecks) और स्थानीय ग्रिड की सीमाएं बिजली-अधिशेष (surplus) वाले क्षेत्रों से कमी वाले क्षेत्रों में बिजली के निर्बाध प्रवाह को रोकती हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण में चुनौतियाँ (Renewable Energy Integration)

  • ग्रिड की अनिश्चितता: भारत के कुल बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी वर्तमान में 17% है (तापीय: 72%, जलविद्युत: 9%, परमाणु: 2%)। मौसम में अचानक बदलाव, जैसे कि बादलों का छा जाना, सौर ऊर्जा के एक बड़े हिस्से को ग्रिड से अचानक बाहर कर देता है।
  • शाम का चरम समय (The Evening Peak): सबसे गंभीर तनाव शाम के समय होता है। सौर ऊर्जा उत्पादन बंद होने के बाद भी चरम मांग बनी रहती है। इसका मतलब है कि शाम की बिजली कटौती सौर अस्थिरता के बजाय लचीली, गैर-सौर बेसलोड आपूर्ति (non-solar baseload supply) की कमी के कारण होती है।

बिजली वितरण कंपनियों के लिए योजनाएं

पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS)

वर्ष 2021 में शुरू की गई यह योजना (वित्त वर्ष 2025-26 तक सक्रिय) ₹3.03 लाख करोड़ से अधिक के परिव्यय के साथ डिस्कॉम सुधारों के लिए वर्तमान में शीर्ष छत्र योजना (umbrella scheme) है। पिछली बेलआउट योजनाओं के विपरीत, RDSS सुधारों पर आधारित और परिणामों से जुड़ी’ (Reforms-based & Results-linked) है। केंद्रीय वित्तपोषण सख्त शर्तों और वार्षिक प्रदर्शन बेंचमार्क को पूरा करने पर ही निर्भर करता है।

  • मुख्य लक्ष्य:
    • अखिल भारतीय स्तर पर AT&C (तकनीकी और वाणिज्यिक) घाटे को घटाकर 12-15% करना।
    • ACS-ARR (औसत लागत और औसत राजस्व) के अंतर को शून्य करना।
  • प्रमुख हस्तक्षेप:
    • स्मार्ट मीटरिंग: बिलिंग अक्षमताओं को खत्म करने और बिजली चोरी रोकने के लिए उपभोक्ताओं, फीडरों और वितरण ट्रांसफार्मरों (DTs) के लिए 25 करोड़ प्रीपेड स्मार्ट मीटर का वित्तपोषण।
    • घाटा कम करने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर: सब-स्टेशनों का अपग्रेडेशन, पुराने कंडक्टरों को एरियल बंच्ड केबल्स (Aerial Bunched Cables) से बदलना और वास्तविक समय की निगरानी के लिए स्काडा (SCADA) प्रणाली लागू करना।
    • कृषि फीडरों का अलगाव: कृषि खपत के सटीक मापन और उनके सौरीकरण को सुगम बनाने के लिए कृषि बिजली लाइनों को भौतिक रूप से अलग करना।

तरलता और भुगतान अनुशासन पहल

सरकार ने बिजली उत्पादकों (Gencos) के प्रति डिस्कॉम्स के भुगतान डिफॉल्ट को रोकने के लिए कड़े वित्तीय तंत्र स्थापित किए हैं।

  • विद्युत (विलंब भुगतान अधिभार और संबंधित मामले) नियम, 2022: इसके तहत डिस्कॉम्स के पुराने बकाये (जो 2022 में ₹1.39 लाख करोड़ थे) को समान मासिक किस्तों (EMIs) में पुनर्गठित किया गया। इसके प्रभाव से वर्ष 2026 तक यह बकाया घटकर लगभग ₹3,300 करोड़ रह गया है, जिससे उत्पादकों को वित्तीय तरलता मिली है।
  • अतिरिक्त उधार सीमा: राज्य सरकारों को उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 0.5% के बराबर अतिरिक्त उधार लेने की अनुमति दी गई है, जो विशेष रूप से बिजली क्षेत्र के सुधारों (जैसे डिस्कॉम्स को समय पर सब्सिडी हस्तांतरण) से जुड़ी है।

उभरते विनियामक ढांचे (2025-2026)

  • मसौदा राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) 2026 और विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025: इनका उद्देश्य क्रॉस-सब्सिडी (जहां औद्योगिक उपभोक्ता आवासीय/कृषि उपभोक्ताओं को सब्सिडी देते हैं) को तर्कसंगत बनाना है ताकि उद्योगों को प्रतिस्पर्धी दरें मिल सकें। यह वितरण क्षेत्र को अनबंडल करके एक ही क्षेत्र में कई आपूर्ति फ्रेंचाइजी की अनुमति देता है।

अप्रत्यक्ष सहायता और संबद्ध योजनाएं

  • पीएम-कुसुम (PM-KUSUM): कृषि पंपों के सौरीकरण से यह योजना डिस्कॉम्स पर दिन के चरम घंटों के दौरान किसानों को अत्यधिक रियायती/मुफ्त बिजली आपूर्ति करने के बोझ को कम करती है।
  • पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना: आवासीय छतों पर सौर पैनल स्थापना को बढ़ावा देकर यह ग्रिड पर घरेलू लोड को कम करती है, जिससे डिस्कॉम्स की बिजली खरीद लागत घटती है।

कुशल बिजली खपत के लिए योजनाएं (Efficient Consumption)

  • मानक और लेबलिंग (स्टार रेटिंग) कार्यक्रम: ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा संचालित इस कार्यक्रम के तहत उपकरणों को उनकी ऊर्जा दक्षता के आधार पर 1 से 5 स्टार दिए जाते हैं। यह वर्तमान में 38 उपकरणों (10 अनिवार्य और 28 स्वैच्छिक) को कवर करता है, जिसमें AC और रेफ्रिजरेटर शामिल हैं।
  • उजाला (UJALA) योजना: एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज लिमिटेड (EESL) द्वारा संचालित इस योजना के तहत घरेलू उपभोक्ताओं को अत्यधिक रियायती दरों पर LED बल्ब, ट्यूबलाइट और ऊर्जा-कुशल पंखे दिए जाते हैं, जो पारंपरिक बल्बों की तुलना में 80% तक कम बिजली की खपत करते हैं।
  • पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना (फरवरी 2024): 1 करोड़ घरों को कवर करने के लक्ष्य के साथ, यह आवासीय उपभोक्ताओं को प्रति माह 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली प्रदान करती है। अधिशेष बिजली को स्थानीय डिस्कॉम को बेचकर अतिरिक्त आय भी अर्जित की जा सकती है।
  • राष्ट्रीय कुशल पंखा कार्यक्रम (NEFP): EESL द्वारा शुरू किया गया यह कार्यक्रम BLDC (ब्रशलेस डायरेक्ट करंट) पंखों की तैनाती को बढ़ावा देता है। एक पारंपरिक पंखा 70-80 वॉट की खपत करता है, जबकि 5-स्टार रेटेड BLDC पंखा केवल 28-35 वॉट लेता है।
  • राष्ट्रीय कुशल भोजन पकाने का कार्यक्रम (NECP): इसके तहत घरों में ऊर्जा-कुशल इंडक्शन कुकटॉप्स वितरित किए जाते हैं, जो पारंपरिक गैस (LPG) और हीटरों की तुलना में अधिक सुरक्षित और कम ऊष्मा हानि वाले होते हैं।
  • इको निवास संहिता: यह आवासीय भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण भवन कोड है, जो प्राकृतिक वेंटिलेशन और निर्माण सामग्री के मानकों को निर्धारित कर घरों को गर्मियों में प्राकृतिक रूप से ठंडा और सर्दियों में गर्म रखने में मदद करता है।

आगे की राह (Way Forward)

  • डिस्कॉम्स का आधुनिकीकरण: स्थानीय स्तर पर होने वाली कटौती को रोकने के लिए उच्च कूलिंग लोड को संभालने हेतु वितरण बुनियादी ढांचे को तत्काल अपग्रेड किया जाना चाहिए। RDSS जैसी योजनाओं का ध्यान स्मार्ट मीटरिंग और ट्रांसफार्मर अपग्रेडेशन पर होना चाहिए।
  • ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) में निवेश: शाम के चरम समय (जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती) से निपटने के लिए भारत को बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) और पंपयुक्त जलविद्युत भंडारण परियोजनाओं (Pumped Storage Hydro Projects) में निवेश तेज करना चाहिए।
  • उन्नत पूर्वानुमान तकनीक अपनाना: जर्मनी जैसे उच्च-नवीकरणीय देशों की तर्ज पर AI/ML आधारित उन्नत मौसम और मांग पूर्वानुमान तकनीकों को अपनाकर ग्रिड प्रबंधक सौर और पवन ऊर्जा के उतार-चढ़ाव को बेहतर ढंग से संभाल सकते हैं।
  • पारेषण ग्रिड का सुदृढ़ीकरण: अंतर-क्षेत्रीय और इंट्रा-स्टेट पारेषण गलियारों (transmission corridors) को अपग्रेड करना आवश्यक है ताकि देश के बिजली-अधिशेष वाले हिस्सों से कमी वाले हिस्सों में बिजली की आपूर्ति निर्बाध रूप से की जा सके।

यूपीएससी अभ्यास प्रश्न (UPSC Practice Questions)

प्रारंभिक परीक्षा (PT) प्रश्न

प्रश्न. भारत में विद्युत क्षेत्र के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत के कुल बिजली उत्पादन मिश्रण में तापीय (thermal) ऊर्जा की हिस्सेदारी आज भी सबसे अधिक बनी हुई है।
  2. स्काडा (SCADA) प्रणाली का उपयोग डिस्पैच केंद्रों द्वारा बिजली की मांग की निगरानी और ग्रिड स्थिरता बनाए रखने के लिए किया जाता है।
  3. बिजली घाटे के आधिकारिक आंकड़े स्थानीय वितरण कंपनियों द्वारा जानबूझकर की जाने वाली सभी ‘लोड शेडिंग’ को पूरी तरह से दर्ज करते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) केवल 1 और 2 व्याख्या: कथन 3 गलत है। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थानीय वितरण कंपनियों (Discoms) द्वारा जानबूझकर की जाने वाली कटौती या रोकी गई मांग (suppressed demand) अक्सर स्काडा मॉनिटरिंग और आधिकारिक आंकड़ों से बाहर रह जाती है। कथन 1 और 2 पूर्णतः सही हैं।

मुख्य परीक्षा (Mains) प्रश्न

प्रश्न. “एक ऐसी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता होने के बावजूद जो सैद्धांतिक रूप से उसकी चरम मांग के अनुरूप है, भारत तीव्र गर्मियों के दौरान स्थानीय स्तर पर बिजली कटौती की समस्या से जूझ रहा है।” इस विरोधाभास के लिए जिम्मेदार संरचनात्मक और परिचालन संबंधी बाधाओं का विश्लेषण कीजिए तथा 24×7 विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के उपाय सुझाइए। (250 शब्द)

मुख्य परीक्षा के उत्तर के लिए संकेत (Hints):

  • प्रस्तावना: हाल ही में बिजली की चरम मांग के 271 GW के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का उल्लेख करें। इस मुख्य विरोधाभास को स्पष्ट करें कि मैक्रो-स्तर (ग्रिड) पर क्षमता पर्याप्त है, लेकिन माइक्रो-स्तर (वितरण) पर प्रणाली अक्सर विफल हो जाती है।
  • बाधाएं (Bottlenecks):
    • वितरण विफलताएं: सरकारी डिस्कॉम्स की वित्तीय कमजोरी, बुनियादी ढांचे के उन्नयन के लिए पूंजी की कमी और ट्रांसफार्मर ट्रिपिंग।
    • डेटा विसंगति: यह समझाएं कि कैसे स्थानीय स्तर पर की जाने वाली जानबूझकर कटौती आधिकारिक स्काडा (SCADA) निगरानी से बाहर रह जाती है।
    • पारेषण मुद्दे: अंतर-राज्यीय और इंट्रा-स्टेट पारेषण बाधाएं।
    • नवीकरणीय ऊर्जा की परिवर्तनशीलता: “इवनिंग पीक” (शाम के चरम समय) की चुनौती की चर्चा करें—जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती लेकिन मांग उच्च बनी रहती है, जिससे थर्मल/हाइड्रो पर दबाव बढ़ता है।
  • आगे की राह (Way Forward):
    • डिस्कॉम्स की वित्तीय व्यवहार्यता और बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण (RDSS के प्रभावी क्रियान्वयन) पर ध्यान केंद्रित करना।
    • दिन की अतिरिक्त सौर ऊर्जा को शाम के समय उपयोग करने के लिए उपयोगिता-पैमाने (utility-scale) की बैटरी स्टोरेज (BESS) प्रणालियों को एकीकृत करना।
    • बेहतर ग्रिड प्रबंधन के लिए उन्नत AI/ML आधारित मौसम पूर्वानुमान को अपनाना।
  • निष्कर्ष: निष्कर्ष निकालें कि वास्तविक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने के लिए ध्यान केवल बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाने से हटाकर अधिक लचीले, विकेंद्रीकृत और वित्तीय रूप से व्यवहार्य वितरण नेटवर्क के निर्माण पर केंद्रित करना होगा।

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