स्मिथियन संश्लेषण (The Smithian Synthesis): नैतिकता और बाज़ार के बीच समन्वय

Adam Smith with Book

9 मार्च, 2026 को आधुनिक आर्थिक विज्ञान के आधारभूत ग्रंथ, ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ (The Wealth of Nations) की 250वीं वर्षगांठ है। इस ऐतिहासिक अवसर ने “दास एडम स्मिथ प्रॉब्लम” (Das Adam Smith Problem) में रुचि फिर से जगा दी है—यह एडम स्मिथ के ‘स्व-हित’ (self-interest) और उनके पहले के ‘सहानुभूति’ (sympathy) के सिद्धांतों के बीच कथित विरोधाभास पर एक ऐतिहासिक बहस है।

एडम स्मिथ का वैचारिक स्पेक्ट्रम: मुख्य विश्लेषण

  • थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स (1759): यह सहानुभूति और “निष्पक्ष दर्शक” (Impartial Spectator) पर केंद्रित है। यह बताता है कि कैसे मनुष्य स्वाभाविक रूप से दूसरों के कल्याण की परवाह करते हैं, जो एक आंतरिक नैतिक दिशा-सूचक (moral compass) बनाता है।
  • द वेल्थ ऑफ नेशन्स (1776): यह स्व-हित और “अदृश्य हाथ” (Invisible Hand) पर केंद्रित है। यह खोज करता है कि कैसे एक संरचित बाज़ार के भीतर व्यक्तिगत लाभ की खोज सामूहिक समृद्धि की ओर ले जाती है।
  • “समस्या” (The Problem): 19वीं सदी के जर्मन अर्थशास्त्रियों ने तर्क दिया कि स्मिथ ने परोपकार (altruism) से स्वार्थ (egoism) की ओर अपना मन बदल लिया था। आधुनिक विद्वान इसे खारिज करते हैं, यह देखते हुए कि स्मिथ स्व-हित को एक ऐसी प्रेरणा मानते थे जो केवल एक नैतिक ढांचे के भीतर ही प्रभावी ढंग से कार्य करती है।
  • एकीकृत दृष्टिकोण: सहानुभूति (Empathy) दोनों के बीच साझा सूत्र है। ‘वेल्थ ऑफ नेशन्स’ में यह “व्यावहारिक सहानुभूति” है (यह समझना कि दूसरे क्या व्यापार करना चाहते हैं), जबकि ‘थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स’ में यह “शुद्ध सहानुभूति” है (यह समझना कि दूसरे क्या महसूस करते हैं)।

आर्थिक नैतिकता (Economic Ethics)

आर्थिक नैतिकता उन नैतिक सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करती है जो वित्तीय और व्यावसायिक गतिविधियों को संचालित करते हैं। स्मिथ के शब्दों में, यह मानवीय व्यवहार पर “आंतरिक” नियंत्रण है।

  • बाज़ार की उपयोगिता के रूप में सहानुभूति: पूंजीवाद के “स्वार्थी” चित्रण के विपरीत, स्मिथ ने तर्क दिया कि बाज़ार विनिमय के लिए “व्यावहारिक सहानुभूति” की आवश्यकता होती है। प्रभावी ढंग से व्यापार करने के लिए, व्यक्ति को दूसरे पक्ष की जरूरतों और भावनाओं को समझना और उनका सम्मान करना चाहिए।
  • विश्वास और लेनदेन की लागत (Trust and Transaction Costs): एक कार्यात्मक अर्थव्यवस्था विश्वास पर निर्भर करती है। जब नैतिक व्यवहार उच्च होता है, तो लेनदेन की लागत (कानूनी शुल्क, पुलिसिंग, बीमा) कम होती है। आर्थिक नैतिकता में गिरावट 2008 के वित्तीय संकट जैसी बाज़ार विफलताओं का कारण बनती है।
  • “निष्पक्ष दर्शक”: यह अवधारणा एक आंतरिक नैतिक न्यायाधीश के रूप में कार्य करती है। यह सुझाव देती है कि व्यक्तियों को निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए एक तटस्थ तीसरे पक्ष के दृष्टिकोण से अपने आर्थिक कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।
  • नैतिक प्रेरणा बनाम स्व-हित: जबकि स्व-हित व्यापार की इच्छा को जन्म देता है, नैतिकता इसके नियम प्रदान करती है। नैतिक दिशा-सूचक के बिना, स्व-हित लालच में बदल जाता है, जो अंततः बाज़ार की सामाजिक वैधता को नष्ट कर देता है।

शासन (Governance)

शासन से तात्पर्य उन बाहरी ढांचों—कानूनों, संस्थानों और राज्य की नीतियों—से है जो आर्थिक गतिविधि को सामान्य कल्याण की ओर निर्देशित करते हैं।

  • संस्थागत अखंडता: शासन उन “संस्थानों” को बनाने के लिए जिम्मेदार है जिनकी स्मिथ ने बात की थी। इसमें संपत्ति के अधिकार, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और नियामक निकाय शामिल हैं जो एकाधिकार को रोकते हैं और “समान अवसर” (level playing field) सुनिश्चित करते हैं।
  • राज्य का “दृश्य हाथ” (Visible Hand): जबकि “अदृश्य हाथ” कीमतों और आपूर्ति का प्रबंधन करता है, राज्य सार्वजनिक वस्तुएं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, बुनियादी ढांचा) प्रदान करता है। स्मिथ ने स्वीकार किया कि कुछ सामाजिक आवश्यकताओं को केवल बाज़ार द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है।
  • समावेशी विकास: आधुनिक संदर्भ में, शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि “राष्ट्र की संपत्ति” कुछ ही हाथों में केंद्रित न हो। प्रगतिशील कराधान और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) जैसी नीतियां धन को उचित रूप से पुनर्वितरित करने के राज्य के नैतिक दायित्व को दर्शाती हैं।
  • नियामक संतुलन: शासन कॉर्पोरेट कदाचार को रोकने के लिए पर्याप्त मजबूत होना चाहिए लेकिन नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त लचीला भी। लक्ष्य एक “नैतिक बाज़ार” बनाना है जहाँ सामाजिक कल्याण के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा फले-फूले।

UPSC चेकपॉइंट: एकीकृत विश्लेषण

GS पेपर 4 (नीतिशास्त्र): नैतिक पूंजी (Moral Capital)

नीतिशास्त्र में, “नैतिक पूंजी” से तात्पर्य उस विश्वास, सद्भावना और वैधता से है जो एक कंपनी नैतिक मानकों का पालन करके अर्जित करती है।

उदाहरण: सत्यम कंप्यूटर घोटाला (2009)

  • “संपत्ति” पर ध्यान: नेतृत्व ने केवल विकास की झूठी छवि पेश करने के लिए बैलेंस शीट और शेयर की कीमतों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया।
  • “नैतिक भावनाओं” की अनदेखी: पारदर्शिता, शेयरधारक विश्वास और वैश्वासिक कर्तव्य (fiduciary duty) के नैतिक दायित्व को त्याग दिया गया।
  • वैधता का संकट: एक बार धोखाधड़ी का खुलासा होने के बाद, कंपनी ने केवल पैसा नहीं खोया; उसने अपना “संचालन का सामाजिक लाइसेंस” खो दिया। यह स्मिथ के इस तर्क को सिद्ध करता है कि बाज़ार ईमानदारी के अंतर्निहित नैतिक ढांचे के बिना जीवित नहीं रह सकते।

GS पेपर 2 और 3 (शासन और अर्थव्यवस्था): सामाजिक न्याय

स्मिथ का यह समन्वय कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के अस्तित्व को न्यायसंगत ठहराता है। यदि बाज़ार असमानता पैदा करता है, तो राज्य को समानता सुनिश्चित करने के लिए नैतिक मध्यस्थ के रूप में कार्य करना चाहिए।

उदाहरण: भारत में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और PDS

  • “संपत्ति” पक्ष: भारत की उच्च जीडीपी विकास दर “वेल्थ ऑफ नेशन्स” पक्ष का प्रतिनिधित्व करती है—कुशल उत्पादन और बाज़ार गतिविधि।
  • “नैतिक आवश्यकता”: हालांकि, अकेले विकास “अंत्योदय” (अंतिम व्यक्ति) तक नहीं पहुंचता है। राज्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) और DBT के माध्यम से हस्तक्षेप करता है।
  • पुष्टि: यह हस्तक्षेप अर्थव्यवस्था के लिए “बाधा” नहीं है। पोषण और वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करके, राज्य मानव पूंजी (Human Capital) का निर्माण करता है, जो बदले में बाज़ार को अधिक मजबूत और टिकाऊ बनाता है।

उदाहरण: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)

  • द्वंद्व: आलोचक अक्सर इसे सरकारी खजाने पर “बोझ” कहते हैं (विशुद्ध आर्थिक दृष्टिकोण)।
  • समन्वय: स्मिथियन परिप्रेक्ष्य से, मनरेगा एक “सामाजिक सुरक्षा जाल” प्रदान करता है। मजदूरी और आजीविका सुरक्षा के लिए एक आधार प्रदान करके, यह उस सामाजिक अशांति को रोकता है जो अन्यथा बाज़ार की स्थिरता को नष्ट कर देगी।

UPSC अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा (PT) प्रश्न

Q. आर्थिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन सा ‘दास एडम स्मिथ प्रॉब्लम’ का सबसे अच्छा वर्णन करता है? A) किसी राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की सटीक गणना करने में कठिनाई। B) स्मिथ द्वारा एक पुस्तक में ‘सहानुभूति’ और दूसरी में ‘स्व-हित’ पर ध्यान केंद्रित करने के बीच कथित विरोधाभास। C) महामंदी को रोकने में ‘अदृश्य हाथ’ की विफलता। D) प्रारंभिक औद्योगिक युग में बाल श्रम के उपयोग की नैतिक दुविधा।

उत्तर: B

मुख्य परीक्षा (Mains) प्रश्न

Q. “नीतिशास्त्र के बिना अर्थशास्त्र एक खोखला विज्ञान है।” एडम स्मिथ की दोहरी विरासत—’द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ और ‘द थ्योरी ऑफ मोरल सेंटीमेंट्स’—के आलोक में इस कथन की चर्चा कीजिए। यह समन्वय 21वीं सदी के भारत की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के लिए किस प्रकार प्रासंगिक है? (250 शब्द)


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