हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 (भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित) से बढ़ाकर 38 करने को मंजूरी दी है। यह कदम 2019 के बाद न्यायिक क्षमता में पहली वृद्धि है।
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
- अनुच्छेद 124(1): भारत का संविधान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति केवल संसद को देता है। मूल रूप से इसमें एक मुख्य न्यायाधीश और सात अन्य न्यायाधीशों का प्रावधान था, जिसे कानून द्वारा बढ़ाने का अधिकार संसद पर छोड़ दिया गया था।
- उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956: यह वह विशिष्ट कानून है जिसमें संसद तब संशोधन करती है जब स्वीकृत संख्या में संशोधन की आवश्यकता होती है।
- पिछला संशोधन (2019): संख्या 31 से बढ़ाकर 34 (CJI सहित) की गई थी।
- प्रस्तावित संशोधन (2026): चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की वृद्धि के लिए अगले सत्र में एक विधेयक पेश किया जाएगा।
वृद्धि की आवश्यकता: लंबित मामलों का संकट (Crisis of Pendency)
इस विस्तार का प्राथमिक कारण मामलों का बढ़ता बोझ है, जो एक महत्वपूर्ण सीमा तक पहुँच गया है:
- वर्तमान बैकलॉग: सर्वोच्च न्यायालय में लगभग 92,385 मामले लंबित हैं।
- महामारी का प्रभाव: ई-फाइलिंग ने पहुँच तो बढ़ाई, लेकिन इसने नए मामलों के आने की गति को भी तेज कर दिया, जिससे निपटान की दर पिछड़ गई।
- संवैधानिक जनादेश: सर्वोच्च न्यायालय “विशेष अनुमति याचिकाओं” (SLPs) और नियमित अपीलों के बोझ से दबा हुआ है, जिससे महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या के मामलों के लिए गठित होने वाली “संवैधानिक पीठ” के पास समय की कमी हो जाती है।
वर्तमान रिक्तियां और सेवानिवृत्तियां (2026)
यह विस्तार ऐसे समय में आया है जब अदालत परिवर्तन के दौर से गुजर रही है:
- वर्तमान रिक्तियां: वर्तमान में दो सीटें खाली हैं (न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल की सेवानिवृत्ति के बाद)।
- आगामी सेवानिवृत्तियां: अगस्त 2026 तक तीन और न्यायाधीश (न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी, पंकज मिथल और संजय करोल) सेवानिवृत्त होने वाले हैं।
- कॉलेजियम प्रणाली: एक बार 1956 के अधिनियम में संशोधन हो जाने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम मौजूदा रिक्तियों और चार नए पदों को भरने के लिए नामों की सिफारिश करेगा।
सर्वोच्च न्यायालय की क्षमता का विकास
| वर्ष | कुल स्वीकृत संख्या (CJI सहित) |
| 1950 | 8 |
| 1986 | 26 |
| 2009 | 31 |
| 2019 | 34 |
| 2026 (प्रस्तावित) | 38 |
आगे की राह
- संख्या से परे: विशेषज्ञों का सुझाव है कि न्यायिक सुधारों में केवल संख्या बढ़ाना काफी नहीं है, बल्कि SLPs को सुव्यवस्थित करना और नियमित अपीलों के लिए एक ‘नेशनल कोर्ट ऑफ अपील’ के निर्माण पर विचार करना चाहिए।
- बुनियादी ढांचे में वृद्धि: न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के साथ भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे (अदालत कक्ष, कर्मचारी और तकनीकी सहायता) में भी आनुपातिक वृद्धि की आवश्यकता होती है।
- समय पर नियुक्तियां: क्षमता बढ़ाने का लाभ तभी मिल सकता है जब कॉलेजियम और सरकार तालमेल के साथ काम करें और बिना देरी के रिक्तियों को भरें।
अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा (PT) के लिए प्रश्न
Q1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
- भारत का संविधान राष्ट्रपति को एक कार्यकारी आदेश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति देता है।
- सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान स्वीकृत संख्या, भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित 34 है।
- सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा कॉलेजियम के साथ परामर्श के बाद की जाती है।
उपरोक्त में से कौन से कथन सही हैं?
A) केवल 1 और 2
B) केवल 2 और 3
C) केवल 1 और 3
D) 1, 2 और 3
उत्तर: B (केवल 2 और 3)
(व्याख्या: अनुच्छेद 124(1) के तहत, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का एकमात्र अधिकार संसद के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं।)
मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए प्रश्न
प्रश्न: “सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत संख्या में वृद्धि भारत में बढ़ते न्यायिक लंबित मामलों के संकट को दूर करने के लिए एक आवश्यक लेकिन अपर्याप्त कदम है।” हाल के घटनाक्रमों के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
